अमेरिकी सरकार के एक वरिष्ठ पदाधिकारी द्वारा हाल ही में दी गई चेतावनी ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है।

अमेरिकी सरकार के एक वरिष्ठ पदाधिकारी द्वारा हाल ही में दी गई चेतावनी ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने कहा है कि इस्लामिस्ट संस्कृति अब वैश्विक समस्याओं के समाधान की अपेक्षा एक गंभीर खतरे के रूप में उभर रही है। अब तक अनेक मुस्लिम संगठन किसी भी आलोचना को “इस्लामोफोबिया” कहकर खारिज करते रहे हैं, किंतु अमेरिका द्वारा इस्लामिस्ट विचारधारा पर सीधा प्रश्न उठाया जाना इस विमर्श में एक नया मोड़ है। उस पदाधिकारी का यह भी कहना था कि मानवता और दया के नाम पर जिन लोगों को शरण दी जाती है, उनमें से कुछ लोग सक्षम होते ही उग्रवाद, आतंकवाद और सांप्रदायिकता का रास्ता अपना लेते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि उन्हें जिस समाज ने शरण दी, उसी की सहिष्णुता के कारण उन्हें अवसर मिला। पहले वे समान अधिकारों की माँग करते हैं, फिर विशेष अधिकारों की, और अंततः संगठित होकर सामाजिक व्यवस्था के लिए चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं।
मेरे विचार से इसी प्रकार की ऐतिहासिक भूल भारत में भी नेहरू परिवार के शासनकाल में हुई थी, जिसके दुष्परिणाम देश आज तक झेल रहा है। सौभाग्यवश, अब उन नीतिगत गलतियों को सुधारने की प्रक्रिया शुरू हुई है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल और असम में स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो लोग अवैध रूप से भारत में घुसे हैं और जिन्हें अब तक दया के नाम पर नहीं निकाला गया, उन्हें देश से बाहर किया जाएगा।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि कुछ राजनीतिक शक्तियाँ ऐसे लोगों को इसलिए संरक्षण देती रही हैं क्योंकि वे उनके लिए चुनावी लाभ का साधन बने। लेकिन अब भारत ऐसी नीति को स्वीकार नहीं करेगा।
मेरे मत में, इस्लामिस्ट उग्रवाद के विरुद्ध दुनिया भर में जो सख्त रुख अपनाया जा रहा है, वह परिस्थितियों को देखते हुए उचित है। इस विषय में अमेरिकी सरकार की सोच की मैं सराहना करता हूँ।