राजनीति काजल की कोठरी है” — सत्ता, कलंक और अपवाद

एक कहावत है कि राजनीति काजल की कोठरी है। जो इस कोठरी में प्रवेश करेगा, वह बिना दाग लगे निकल ही नहीं सकता। वर्तमान भारत में यह बात लगभग सच दिखाई देती है। राजनीति में घुसने वाले अधिकांश लोग काजल की कोठरी में घुसते ही मोहग्रस्त हो गए। उनका सारा हृदय काला हो गया और वे दोनों हाथों से धन लूटने लगे। लेकिन जो लोग ईमानदार थे, वे भी कहीं-न-कहीं बदनाम होते चले गए।

इस काजल की कोठरी से मैं आराम से बिना दाग लगे इसलिए निकल पाया, क्योंकि मैंने स्थानीय स्तर पर राजनीति को पारदर्शी बनाया। मैंने अपने जीवन में किसी भी व्यक्ति का कोई ऐसा कार्य किया ही नहीं, जो प्रशासनिक सहयोग से किया जा सकता था। मैं लगातार उससे बचता रहा। दूसरी तरफ, नगर पालिका अध्यक्ष रहते हुए जब मुझे इस तरह के धन की जरूरत हुई, तो मैंने पारदर्शी तरीके से घूस लेना शुरू किया।

स्पष्ट है कि आज तक मैं इस काजल की कोठरी में लंबे समय तक रहने के बाद भी उसके दाग से बच गया। लेकिन मैं तो एक साधारण नगर पालिका अध्यक्ष रहा। मनमोहन सिंह भी 10 वर्षों तक प्रधानमंत्री रहने के बाद कलंक से पूरी तरह बच गए। वर्तमान समय में नरेंद्र मोदी भी इस कलंक से पूरी तरह बचे हुए हैं।

इस तरह मैं यह कह सकता हूं कि काजल की कोठरी में लंबे समय तक रहने वाला व्यक्ति आमतौर पर इस कलंक से नहीं बच सकता, लेकिन विशेष लोग कुछ विशेष सावधानियों के आधार पर इस कलंक से बच जाते हैं।