रायपुर की घटना से उठा सवाल: परिवार की स्वतंत्रता और कानून की सीमा

रायपुर शहर की एक घटना है। यहां तीन-चार वर्ष पूर्व एक 50 वर्षीय युवक की पत्नी छोड़कर चली गई। घर में 15 वर्ष की लड़की और उसका 50 वर्षीय पिता प्रायः घर में साथ रहते थे। परिवार के अन्य सदस्य भी कभी-कभी आते-जाते थे। इस बीच एकांत पाकर पिता के अपनी लड़की के साथ शारीरिक संबंध बन गए। बाद में वह लड़की गर्भवती हो गई। अब पिता ने अपने बहन या कुछ अन्य लोगों से चर्चा की और चर्चा के बाद यह तय हुआ कि इस बच्चे को किसी तरह छुपा दिया जाए। जो बच्चा हुआ, उस बच्चे को किसी नर्स के माध्यम से किसी दूसरे व्यक्ति को दे दिया गया और उस नर्स को बदले में डेढ़ लाख रुपया भी प्राप्त हुआ। अब यह बात उस बच्ची की मां को पता चली और उस बच्ची ने अपनी मां को सारी सच बात बता दी। मां ने यह बात पुलिस वालों को बता दी। अब तक पुलिस 15 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है। बच्ची के पिता, उसकी बहन, कुछ रिश्तेदार, डॉक्टर, नर्स, बच्चे को खरीदने वाला और बिचौलिया। अभी और भी लोग गिरफ्तार किए जाएंगे।

मैं नहीं समझता कि इस पूरी घटना में कुल मिलाकर क्या अपराध हुआ। यदि 15 वर्ष की बच्ची के साथ पिता ने कोई संबंध बनाए, तो अनैतिक था या गैरकानूनी। उस बच्चे को परिवार के लोगों ने कहीं मारा नहीं, उसको सुरक्षित किसी व्यक्ति को दे दिया। इस मामले में सरकार को इतना बढ़-चढ़कर हस्तक्षेप करने की जरूरत क्या है। लोक-लाज के डर से या सामाजिक अनुशासन के चलते उस तथाकथित पिता ने उस बच्चे को किसी को दिया। सारी बातें पूरी तरह गुप्त हुईं। अधिक से अधिक आप एक अपराध कह सकते हैं, जो सिर्फ गैरकानूनी था। पिता ने अपनी लड़की के साथ जो संबंध बनाए, वह भी कोई बहुत बड़ा गंभीर अपराध नहीं हुआ है। इसलिए मैं सोचता हूं कि इस प्रकार की घटनाओं को तिल का ताड़ बनाना न सरकारी कानून के लिए उचित है, न मीडिया के लिए उचित है। हर घर में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं और इस प्रकार की परिस्थितियों में परिवार के लोग सामाजिक प्रतिष्ठा के डर से कोई मार्ग निकालते हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि यदि कोई मार्ग निकल गया तो सारे लोग अपराधी हो गए। सरकार इस प्रकार के अनावश्यक कानून पर फिर से विचार करे।

पक्ष-विपक्ष में कई प्रकार के विचार आए और अभी आएंगे ही। लेकिन मेरा अब भी मानना है, सेक्स एक प्राकृतिक भूख है। उसे अनुशासित किया जा सकता है, लेकिन बलपूर्वक नहीं रोका जा सकता है, क्योंकि बलपूर्वक रोकने से विध्वंस का भी खतरा होता है। हमारे पुराने जमाने के ऋषि-मुनि काम की शक्ति को अच्छी तरह पहचानते थे। इसीलिए उन्होंने यह व्यवस्था दी थी कि देवर और भाभी के आपसी संबंध स्थितिअनुसार मां-बेटे के समान भी हो सकते हैं और परिस्थिति अनुसार पति-पत्नी के समान भी हो सकते हैं। जो होगा, इसका निर्णय परिवार करेगा, रिश्ते-नाते के लोग करेंगे। इस मामले में समाज को हस्तक्षेप विशेष परिस्थिति में ही करना चाहिए, सामान्यतः नहीं, और कानून का तो यह विषय ही नहीं है। देवर-भाभी के संबंध कैसे हों, इससे क्या लेना-देना है समाज को और क्या लेना-देना है कानून को। इसलिए मेरा यह सुझाव है कि समाज और कानून को अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। परिवार के अपने आंतरिक मामलों में परिवार को अधिकतम स्वतंत्रता दे देनी चाहिए।