ब्राह्मण परंपरा: त्याग, विद्वत्ता और सामाजिक सम्मान की अवधारणा

मैं बचपन से ही इस विचार का समर्थक रहा हूँ कि ब्राह्मणों ने समाज के लिए उल्लेखनीय त्याग किया है। मेरा यह भी मानना है कि वर्तमान समय में जन्म से ब्राह्मण कहलाने वाले अनेक लोगों में अन्य वर्गों की अपेक्षा अधिक गरीबी भी देखने को मिलती है और विद्वत्ता भी। उनकी विद्वत्ता, त्याग और सादगी को देखकर स्वाभाविक रूप से समाज के मन में उनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है।

किन्तु दुख तब होता है, जब कुछ मुट्ठीभर लोग इस श्रद्धा को अपना कर्तव्य न मानकर अधिकार समझने लगते हैं। हम वर्ण व्यवस्था के आधार पर ब्राह्मणों को श्रेष्ठ मानते रहे हैं और भविष्य में भी मानने में हमें आपत्ति नहीं है। परंतु यदि कोई स्वयं को श्रेष्ठ घोषित करके दूसरों को निम्न मानने लगे, तो यह स्वीकार्य नहीं हो सकता। किसी भी प्रकार की दादागिरी या वर्चस्व की प्रवृत्ति को समाज स्वीकार नहीं कर सकता।

ब्राह्मणों का सम्मान करना समाज का कर्तव्य है, उनका जन्मसिद्ध अधिकार नहीं। वर्ण व्यवस्था की मूल भावना में सभी को समान मानवीय गरिमा प्राप्त है; कोई उच्च या नीच नहीं है। इसलिए कुछ लोग संगठन की शक्ति के आधार पर अन्य वर्णों को कमतर आँकने की भूल न करें।

इसी प्रकार, कुछ परिस्थितियों में ऐसा प्रतीत होता है कि Shankaracharya पद से जुड़े व्यक्तियों के आचरण पर भी प्रश्न उठते हैं। शंकराचार्य का सम्मान पूरे हिंदू समाज का कर्तव्य है, किंतु यह सम्मान आचरण और मर्यादा से जुड़ा होना चाहिए। हाल की घटनाओं, जैसे Mukteshwaranand के राजनीतिक विवादों में उलझने से, समाज में यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि क्या शंकराचार्य हिंदू धर्म के प्रवक्ता हैं, या हिंदू धर्म की परंपरा और सिद्धांत उनसे भी ऊपर हैं।

मेरे विचार से वर्ण व्यवस्था और आश्रम व्यवस्था जैसे सिद्धांत किसी भी व्यक्ति या पद से ऊपर माने जाने चाहिए। ब्राह्मण और शंकराचार्य—दोनों के लिए आचरण, ज्ञान और पात्रता की स्पष्ट कसौटी होनी चाहिए। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि बिना निर्धारित मानकों को पूरा किए न कोई ब्राह्मण कहलाए और न ही शंकराचार्य जैसे उच्च पद पर आसीन हो सके।