अमेरिका – भारत के संकट में सहयोग

एक-दो महीने पहले ही भारत और अमेरिका के बीच एक समझौता हुआ था। उस समझौते के अच्छे परिणाम अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। आज जब ईरान ने भारतीय तेल के आवागमन को संकट में डाल दिया, तब अमेरिका ने आगे बढ़ते हुए भारत को एक महीने तक रूस से तेल खरीदने की स्वतंत्रता दे दी। भारत को इस संकट से उबरने में अमेरिका ने पहल करके अच्छा कार्य किया है।
मेरा मानना है कि अमेरिका की इस पहल से सोनिया जी को अवश्य कष्ट हुआ होगा, क्योंकि वे भारत और अमेरिका के बीच होने वाले समझौते की भी विरोधी रही हैं और वर्तमान स्थिति से भी असहमत दिखाई देती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी हार्दिक इच्छा रही है कि भारत किसी न किसी युद्ध में फँस जाए—चाहे वह अमेरिका से भिड़ जाए, चीन से लड़ जाए या पाकिस्तान से टकरा जाए।
लेकिन सोनिया गांधी यह बर्दाश्त नहीं कर सकतीं कि भारत युद्ध से बचकर शांति के रास्ते पर निकल जाए। क्योंकि जब भारत किसी देश से युद्ध करेगा तभी उस देश को ब्लैकमेल करने की स्थिति बन सकती है; अन्यथा कोई देश किसी भारतीय नेता को क्यों महत्व देगा।
आज भारत यदि किसी भी युद्ध से बचकर निकल रहा है तो तथाकथित गांधीवादियों को बहुत असुविधा हो रही है। मुझे यह समझ में नहीं आता कि गांधी के नाम पर राजनीति करने वाले लोग भारत को बार-बार युद्ध की ओर क्यों धकेलना चाहते हैं।
नाम रखते हैं राहुल गांधी, और भारत सरकार से कहते हैं—लड़ो, भिड़ो, मारो या मर जाओ; किसी के साथ समझौता मत करो। यह एक विचित्र प्रकार का विपक्ष है।
गांधी के नाम पर राजनीति करने वाले इस नेहरू परिवार की जो दुर्दशा हुई है, वह उनकी अपनी गलतियों के कारण है, किसी और के कारण नहीं।