ऊर्जा की सस्ती कीमत और श्रम शोषण पर बहस

कृत्रिम ऊर्जा सस्ती हो — यह श्रम का शोषण करने का बहुत बड़ा षड्यंत्र है। यह पूंजीवादी मंत्र है। इसी सिद्धांत को लेकर हम लोगों ने भारत की अर्थनीति पर विचार किया है।

मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव है कि हर कम्युनिस्ट पूंजीपतियों का दलाल होता है। आमतौर पर कम्युनिस्ट कोई व्यापार नहीं करते, कोई नौकरी नहीं करते, कोई खेती और मजदूरी नहीं करते। वे तो सिर्फ एक ही काम करते हैं — श्रमजीवियों के नाम पर पूंजीपतियों को ब्लैकमेल करके अपना खर्चा चलाते हैं।

कम्युनिस्ट कभी भी डीजल, पेट्रोल और बिजली का मूल्य नहीं बढ़ने देते, क्योंकि यदि इनका मूल्य बढ़ जाएगा तो श्रम का मूल्य बढ़ जाएगा, आर्थिक असमानता घट जाएगी और साम्यवाद असफल हो जाएगा। इसलिए साम्यवादी तो आम तौर पर ऐसा करते ही हैं।

मीडिया वाले भी पूंजीपतियों के साथ जुड़े रहते हैं, इसलिए वे भी कभी डीजल, पेट्रोल और बिजली का दाम नहीं बढ़ने देते। सरकार भी पूंजीपतियों के टैक्स से ही चलती है, इसलिए उनकी भी यह हिम्मत नहीं होती कि वे डीजल-पेट्रोल का मूल्य बढ़ा दें।

लेकिन समाज में कुछ ऐसे भी नासमझ हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के भी डीजल, पेट्रोल और बिजली की मूल्य वृद्धि का विरोध करते रहते हैं। वे जानते ही नहीं कि इसकी मूल्य वृद्धि का समाज और गरीबों पर कितना अच्छा प्रभाव पड़ेगा।

आप गंभीरता से विचार करिए कि जो लोग डीजल, पेट्रोल और बिजली की कीमत बढ़ने का विरोध करते हैं, उनमें से कोई एक भी कभी इस बात का विरोध नहीं करता कि खाद्य तेल पर से जीएसटी हटा दिया जाए, दालों पर से टैक्स समाप्त कर दिया जाए, कपड़ा और दवा टैक्स फ्री होना चाहिए। कभी इस बात की मांग नहीं होती। लेकिन यही लोग डीजल, पेट्रोल और बिजली के नाम पर सामने आकर खुलकर विरोध करते हैं, क्योंकि पूंजीपतियों के एजेंट चुपचाप इसी तरह समाज में भ्रम फैलाते हैं।

अब समय आ गया है कि सब प्रकार के अन्य टैक्स हटाकर उन्हें डीजल, पेट्रोल और बिजली पर लगा दिया जाए। श्रम के साथ न्याय होना चाहिए। पूंजीपतियों की दलाली करने वाले बेनकाब होने चाहिए।

मेरा स्पष्ट मानना है कि जो लोग डीजल, पेट्रोल और बिजली की मूल्य वृद्धि का विरोध करते हैं, वे जाने-अनजाने पूंजीपतियों की दलाली करते हैं।