नई समाज व्यवस्था पर चर्चा
नई समाज व्यवस्था पर चर्चा
कल मैं रायपुर शहर से कुछ दूर स्थित आनंद धाम अपने मित्र से मिलने गया था। आनंद धाम वह स्थान है जहाँ करपात्री जी ने एक बड़ा यज्ञ किया था, और उसी यज्ञ के आधार पर प्रतिवर्ष लगभग पंद्रह दिनों का एक औपचारिक यज्ञ भी आयोजित किया जाता है। आनंद धाम एक उपेक्षित धार्मिक स्थल है, जबकि वह स्थान और सुविधाओं की दृष्टि से अत्यंत उपयुक्त है।
मेरे मित्र ने आनंद धाम के विकास में सहयोग देने का निवेदन किया। मैं इससे प्रभावित हुआ, लेकिन मैंने स्वयं को रोक लिया। मैंने यह विचार किया कि क्या अपनी शक्ति इस कार्य में लगाना उचित होगा।
कार्य के तीन क्षेत्र हैं—धर्म, राष्ट्र और समाज—और तीनों ही महत्वपूर्ण हैं। धर्म की चिंता शंकराचार्य कर रहे हैं, राष्ट्र की चिंता संघ कर रहा है, लेकिन समाज की चिंता करने वाले लोग बहुत कम हैं। मैंने यह भी विचार किया कि क्या मुझे अपना वर्तमान कार्य छोड़कर धर्म या राष्ट्र की चिंता में ही जुड़ जाना चाहिए। यही सोचकर मैंने स्वयं को नियंत्रित करने का प्रयास किया।
>मैं इस बात से संतुष्ट नहीं हूँ कि धर्म और राष्ट्र की तुलना में समाज को उपेक्षित कर दिया जाए। परिवार व्यवस्था, गाँव व्यवस्था और विश्व व्यवस्था—इन सभी को समान रूप से महत्वपूर्ण मानना आवश्यक है, लेकिन धर्म व्यवस्था और राष्ट्र व्यवस्था की तुलना में परिवार, गाँव और विश्व व्यवस्था की लगातार उपेक्षा हो रही है।
यह अवश्य संतोष का विषय है कि पिछले कुछ वर्षों से संघ परिवार राष्ट्र के साथ-साथ समाज पर भी ध्यान दे रहा है। यही कारण है कि मैं समाज के साथ-साथ धर्म और राष्ट्र व्यवस्था पर भी विचार करता हूँ। फिर भी मैं इस बात को भली-भाँति समझता हूँ कि धर्म और राष्ट्र की चिंता करने वाले लोग समाज को बहुत अधिक उपेक्षित कर रहे हैं, जबकि मेरे विचार में समाज व्यवस्था, धर्म और राष्ट्र की चिंता से भी अधिक महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
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