नई मतदाता सूची और बदलता राजनीतिक परिदृश्य

पिछले कुछ समय से नई मतदाता सूची के आधार पर चुनाव हो रहे हैं। इन चुनावों के माध्यम से यह बात कही जा रही है कि पिछले चुनावों में विदेशी मुसलमानों को भारत का मतदाता बनाकर चुनाव लड़े जाते थे। यह भी आरोप लगाया जाता है कि कुछ विदेशी मुसलमान भारत में रहकर कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों का प्रचार करते थे और बदले में उन्हें आधार कार्ड अथवा अन्य पहचान पत्र देकर मतदाता बना दिया जाता था। इस प्रकार विदेशी मुसलमान और वर्तमान विपक्षी दल मिलकर भारतीय राजनीति को प्रभावित कर रहे थे।

यह लोग संविधान को अपनी जेब में लेकर चलते थे। मुट्ठी भर अंबेडकरवादी भी इनके साथ जुड़े रहते थे। आरोप यह भी लगाया जाता है कि ये सभी लोग मिलकर हिंदुओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखना चाहते थे और उन्हें बराबरी का अधिकार नहीं देना चाहते थे।

आपने आज देखा कि ममता बनर्जी ने चुनाव हारने के बाद भी त्यागपत्र देने से इनकार कर दिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि संविधान राहुल गांधी की जेब में है और ममता बनर्जी इस सड़े-गले संविधान को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।

अब ममता बनर्जी तथा राहुल गांधी को यह समझ लेना चाहिए कि भारत में विदेशी मुसलमानों का कोई भविष्य नहीं है। अब उन्हें भारतीय मतदाताओं का ही विश्वास प्राप्त करना होगा, जिनमें हिंदू बहुमत में हैं। अब संविधान को जेब में रखने के बजाय समाज के बीच लाना पड़ेगा और संविधान के अनुसार ही कार्य करना पड़ेगा।

आप जल्दी ही देखेंगे कि भारत में हिंदुओं का दो-तिहाई बहुमत अपनी सरकार बनाकर संविधान में संशोधन करेगा और विरोधी पक्ष केवल विरोध करता रह जाएगा। यह नकली संविधान उनकी जेब में ही रह जाएगा, समाज के बीच दिखाई नहीं देगा। इसलिए समाज की ताकत को पहचानिए और नींद से जागिए।