बंगाल और असम चुनाव में हिंदू एकजुटता की चर्चा
इस बार के बंगाल और असम के चुनाव में यह खास बात अनुभव की गई कि हिंदुओं में कोई विभाजन नहीं हुआ। मुसलमान, कांग्रेस और ममता बनर्जी लगातार यह प्रयास कर रहे थे कि हिंदुओं में विभाजन हो, लेकिन बंगाल और असम के सभी आदिवासियों और दलितों ने खुलकर भारतीय जनता पार्टी को वोट दिया। यहाँ तक कि कुछ उत्तर प्रदेश के तथाकथित स्वर्णों को भी यह उम्मीद थी कि हिंदू विभाजित हो जाएगा, लेकिन धन्य हैं बंगाल के हिंदू, जिन्होंने मुसलमानों, कांग्रेस और ममता की सारी योजनाओं को असफल कर दिया और अंत तक एकजुट रहे। पूरे देश को बंगाल और असम से सबक सीखना चाहिए।
इसी तरह मुसलमानों का भी एकजुट रुझान साफ दिखाई दिया है। इन पाँच प्रदेशों में मुसलमानों की आबादी लगभग 20% है, लेकिन चुनाव जीतने वाले विपक्षी उम्मीदवारों में आधे से अधिक मुसलमान हैं। मुसलमानों ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि चुनाव जीतने वाला उम्मीदवार विपक्ष का ही हो, हिंदू विचारधारा वाला नहीं। किसी हिंदू विचारधारा वाले को मुसलमानों ने वोट देना पसंद नहीं किया। लेकिन यह धार्मिक ध्रुवीकरण मुसलमानों के लिए अधिक घातक हो सकता है और इस विषय पर अब मुसलमानों को गंभीरता से सोचना चाहिए। मुसलमानों की सुरक्षा समाज दे सकता है, विपक्ष नहीं।
बंगाल चुनाव ने एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा कर दिया है कि चुनाव के समय या मतगणना तक ममता बनर्जी को यह आभास कैसे नहीं हुआ कि चुनाव में बराबरी का टकराव है। यह बात बिल्कुल साफ हो रही है कि इंदिरा गांधी का कार्यकाल बंगाल में दोहराया गया है। मैं स्वयं उस समय का प्रत्यक्षदर्शी हूँ, जब 99% लोग इंदिरा गांधी के पक्ष में बात कर रहे थे, लेकिन उन्हीं लोगों ने बड़ी संख्या में इंदिरा गांधी के खिलाफ वोट दिया, क्योंकि किसी भी व्यक्ति में खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं थी। ऐसा लगता था कि हर आदमी जासूस हो सकता है और किसी को भी खतरे में डाल सकता है।
ठीक ऐसा ही वातावरण बंगाल में था। ममता बनर्जी का इतना अधिक डर था कि कोई व्यक्ति उनके विरुद्ध जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। आम मतदाता ममता बनर्जी के खिलाफ था, लेकिन सार्वजनिक रूप से उनके पक्ष में बोल रहा था। इतना आतंक बंगाल में था, उतना शायद किसी अन्य प्रदेश में नहीं रहा होगा।
यही कारण है कि इंदिरा गांधी को मतगणना होने तक हार की उम्मीद नहीं थी और ममता बनर्जी को भी मतगणना आधी होने तक हार की आशंका नहीं हुई, क्योंकि हर व्यक्ति उनकी चापलूसी कर रहा था। यहाँ तक कि ममता बनर्जी के जासूस भी उनके सामने सच बताने से डर रहे थे।
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