डीजल-पेट्रोल मूल्य वृद्धि और बदलती अर्थव्यवस्था
भारत सरकार ने आज डीजल-पेट्रोल का मूल्य सिर्फ ₹3 प्रति लीटर बढ़ाया है, जबकि कम-से-कम इसे ₹10 प्रति लीटर तो बढ़ना ही चाहिए था। यदि 10 वर्ष पहले की तुलना करें, तो आज उसकी तुलना में डीजल-पेट्रोल बहुत सस्ता हुआ है। यही कारण है कि डीजल-पेट्रोल की खपत बहुत अधिक बढ़ती चली गई, क्योंकि 10 वर्ष पहले विदेश से डीजल-पेट्रोल जिस मूल्य पर आता था, इस वर्ष उससे बहुत अधिक महंगा हो गया है।
दूसरी तरफ, आम भारतीय की क्रय-शक्ति भी बहुत अधिक बढ़ी है। लोगों का जीवन-स्तर भी बहुत ऊंचा हुआ है। मजदूर की मजदूरी भी 10 वर्षों में ढाई गुना बढ़ गई है। पूंजीपतियों का जीवन-स्तर भी 10 वर्षों में लगभग 7–8 गुना ऊंचा हो गया है। ऐसी स्थिति में डीजल-पेट्रोल का मूल्य बहुत अधिक होना चाहिए था। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए सरकार ज्यादा बढ़ाने से झिझक रही है। फिर भी ₹10 तो बढ़ता ही चाहिए था।
डीजल-पेट्रोल अनिवार्य आवश्यकता की वस्तु नहीं है, बल्कि सुविधा की वस्तु है। डीजल-पेट्रोल की कुल खपत लगभग 5 प्रतिशत गरीब लोग करते हैं, 25 प्रतिशत मीडियम क्लास के लोग करते हैं और 70 प्रतिशत अपर क्लास के लोग करते हैं। डीजल-पेट्रोल की खपत विलासिता में अधिक है, सुविधा में कम, और अनिवार्य आवश्यकता में तो नगण्य है। इसलिए मेरे विचार से सरकार को रेट और बढ़ाना चाहिए।
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