गांधी और विवेकानंद का नया संगम : भारतीय राजनीति का बदलता अध्याय
यह भी एक रहस्य ही बना हुआ है कि इतने लंबे समय तक गांधी और विवेकानंद के बीच कभी कोई सुलह नहीं हुई, और पिछले सात-आठ वर्षों से दोनों एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। आज संघ के नेतृत्व की नरेंद्र मोदी सरकार गांधी के मार्ग पर चल रही है और गांधीवादी वर्तमान समय में मोहन भागवत को अपना आदर्श मान रहे हैं।
यह विचित्र सहयोग पिछले सात-आठ वर्षों से बना है, क्योंकि यह बात जगजाहिर थी कि गांधीवादियों पर कम्युनिस्टों का बहुत ज्यादा प्रभाव था और संघ पर सावरकरवादियों का। जब तक संघ सावरकरवादियों से मुक्त नहीं होता और जब तक गांधीवादी कम्युनिस्टों से मुक्त नहीं होते, तब तक यह विवाद निपटना असंभव था।
हम लोगों ने लंबे समय से यह प्रयत्न किया कि देश के अच्छे लोग एक साथ हो जाएं और इस मामले में गांधीवादी और संघ के लोगों का एक साथ जुड़ना अधिक आवश्यक है, क्योंकि दोनों के विचार एक हैं, लेकिन अतिवादी लोग दोनों के मिलने को रोक रहे हैं। हम लोगों ने वह बाधा दूर कर दी।
अब गांधीवादियों में कम्युनिस्ट लगभग नहीं के बराबर हैं। सब बाहर कर दिए गए हैं। सब संपत्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं, पोस्ट की लड़ाई लड़ रहे हैं और गांधीवादी लोकस्वराज की लड़ाई लड़ रहे हैं। दूसरी तरफ संघ ने भी प्रवीण तोगड़िया तथा कुछ अन्य सावरकरवादियों से किनारा कर लिया है। अब तो वे हिंदू विरोधियों के साथ मिलकर मोदी-भागवत को ही चुनौती दे रहे हैं।
इस तरह हम लोगों के प्रयत्न से पिछले 8 वर्षों में यह एक बहुत बड़ा काम सफल हुआ है। अब भारत ही नहीं, सारी दुनिया में नरम हिंदुत्व का प्रभाव बढ़ेगा, क्योंकि हम अतिवादी कम्युनिस्टों और अतिवादी सावरकरवादियों से मुक्त हो चुके हैं। सावरकरवादियों ने बहुत मेहनत करके सवर्ण और अवर्ण के मुद्दे को उछालना चाहा था, जो लगभग बेमौत मर गया है।
Comments