समाज, तंत्र और व्यक्ति—इन तीनों के बीच अलग-अलग भूमिकाएँ होती हैं।
22 जनवरी, प्रातःकालीन सत्र
समाज, तंत्र और व्यक्ति—इन तीनों के बीच अलग-अलग भूमिकाएँ होती हैं। तंत्र समाज का प्रबंधक होता है, न कि व्यक्ति का शासक। जब समाज और तंत्र के बीच कार्य-विभाजन होता है, तो समाज का यह कर्तव्य बनता है कि वह तंत्र को उतने ही कार्यों की जिम्मेदारी सौंपे, जितनी उसकी क्षमता हो। यदि तंत्र को उसकी क्षमता से अधिक कार्य सौंप दिए जाएँगे, तो स्वाभाविक रूप से अव्यवस्था उत्पन्न होगी।
दूसरी ओर, तंत्र से भी यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह उतना ही कार्य स्वीकार करे, जितना वह करने में सक्षम हो। यदि कोई कार्य उसकी क्षमता से बाहर है, तो उसे समाज के समक्ष अपनी असमर्थता स्पष्ट रूप से प्रकट कर देनी चाहिए। क्षमता से अधिक जिम्मेदारी स्वीकार करना तंत्र के लिए भी उतना ही गलत है।
वर्तमान भारत में हम देख रहे हैं कि तंत्र लगभग सारी जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर उठा रहा है, जबकि उन सभी जिम्मेदारियों को निभाना उसकी क्षमता में नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि कई मामलों में समाज ने जब कोई जिम्मेदारी सौंपी ही नहीं, तब भी तंत्र स्वयं आगे बढ़कर उसे अपने ऊपर ले रहा है। समाज ने यह नहीं कहा कि आप जुआ रोकें, शराब रोकें, तंबाकू रोकें या बाल विवाह रोकें, फिर भी तंत्र ने बुरी नीयत से इन कार्यों को अपने जिम्मे ले लिया है।
नई समाज-व्यवस्था में हम तंत्र की वास्तविक क्षमता का आकलन करके ही उसके पास कार्य छोड़ेंगे। शेष सभी कार्य तंत्र से वापस ले लिए जाएँगे, और यदि तंत्र उन्हें लौटाने को तैयार नहीं होगा, तो समाज उन्हें बलपूर्वक छीनने का अधिकार भी रखेगा। समाज मालिक है। तंत्र जितना कार्य अपने जिम्मे ले, उसे पूरा करना उसकी जिम्मेदारी है; और यदि वह किसी कार्य को पूरा नहीं कर सकता, तो उसे वह जिम्मेदारी स्वीकार ही नहीं करनी चाहिए।
हम सुरक्षा और न्याय के अतिरिक्त सभी कार्य तंत्र से वापस ले लेंगे और तंत्र से केवल यही अपेक्षा करेंगे कि वह सुरक्षा और न्याय की जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा और सफलता के साथ निभाए।
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