वर्तमान विश्व में, और विशेषकर भारत में, बलात्कार की लगातार बढ़ती घटनाएँ एक गंभीर चर्चा का विषय बन गई हैं।

7 फरवरी – प्रातःकालीन सत्र
वर्तमान विश्व में, और विशेषकर भारत में, बलात्कार की लगातार बढ़ती घटनाएँ एक गंभीर चर्चा का विषय बन गई हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में बलात्कार की घटनाएँ बढ़ रही हैं, या फिर बलात्कार के मामलों का प्रचार और सार्वजनिक चर्चा पहले की तुलना में अधिक हो गई है?
यह तथ्य है कि पुराने समय में भी बलात्कार की घटनाओं का अनुपात लगभग वही था, जो आज दिखाई देता है। अंतर यह है कि उस समय की सामाजिक परिस्थितियाँ भिन्न थीं। पहले महिला और पुरुष के बीच एक संतुलित सामाजिक दूरी बनी रहती थी, जिसके कारण ऐसी घटनाएँ अपेक्षाकृत कम दिखाई देती थीं। वर्तमान समय में यह दूरी कम हुई है और साथ ही सामाजिक अनुशासन में भी गिरावट आई है। इसके अतिरिक्त, मीडिया प्रचार की भूमिका भी पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गई है।
मेरा अनुभव यह संकेत देता है कि बलात्कार की संख्या में पुराने समय की तुलना में कोई अत्यधिक या असामान्य वृद्धि नहीं हुई है। पहले भी लगभग 13 वर्ष की आयु के बाद लड़के–लड़कियों की सुरक्षा को लेकर समाज अधिक सतर्क रहता था। यदि उनके बीच किसी प्रकार का आकर्षण होता भी था, तो उसे सार्वजनिक रूप से प्रचारित नहीं किया जाता था।
वर्तमान समय में, एक ओर आपने आयु संबंधी सीमाएँ बढ़ा दीं, और दूसरी ओर व्यभिचार और बलात्कार जैसे विषयों को एक ही श्रेणी में रख दिया। वेश्यावृत्ति पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया, पशुओं के साथ अनैतिक संबंधों पर भी रोक लगा दी गई। इस प्रकार आपने एक प्रकार का बाँध तो बना दिया, लेकिन निकास के सभी मार्ग बंद कर दिए। ऐसे में यदि बाँध टूटता है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि दोष किसका है।
इसी कारण मेरे विचार में बलात्कार को केवल एक स्वाभाविक अपराध न मानकर, एक हद तक कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई समस्या के रूप में भी देखना चाहिए—जिसके विस्तार में हमारी राजनीतिक और नीतिगत व्यवस्था की भूमिका भी कम नहीं है।
आइए, हम सब मिलकर इस समस्या पर गंभीरता से और मूल कारणों को समझते हुए समाधान के बारे में विचार करें।