नई समाज व्यवस्था में समानता की पुनर्परिभाषा

22 जून प्रातःकालीन सत्र

समाज-विरोधी तत्वों ने दुनिया में जो अनेक परिभाषाएँ विकृत कर दी हैं, उसी की कड़ी में समानता की परिभाषा को भी विकृत किया गया। यह प्राकृतिक रूप से सही है कि दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति किसी भी मामले में समान हो ही नहीं सकते। साथ ही यह बात भी सच है कि दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता समान होती है।

इन दो मूलभूत सिद्धांतों में बदलाव करके समानता की एक गलत परिभाषा प्रसारित कर दी गई और उस परिभाषा को संविधानों में डाल दिया गया, जबकि असमानों को कभी समान बनाया ही नहीं जा सकता। उनकी असमानता कम की जा सकती है, लेकिन वह समाप्त नहीं हो सकती।

समानता की जो गलत परिभाषा बनाई गई है, उसके कारण ही समाज में अनेक प्रकार के टकराव पैदा हो रहे हैं, क्योंकि जब पूर्ण समानता संभव ही नहीं है, तो इस प्रकार के आश्वासन क्यों दिए जाने चाहिए।

कमज़ोरों की सहायता करना मज़बूतों का कर्तव्य होता है, कमज़ोरों का अधिकार नहीं। कमज़ोरों को मज़बूतों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। दुर्भाग्यवश, विकृत परिभाषा ने कमज़ोरों की मदद को उनका अधिकार घोषित कर दिया, और यह दुनिया में टकराव के प्रमुख कारणों में से एक है।

इसलिए अब समानता की पूरी परिभाषा को बदल देना चाहिए।