पति-पत्नी संबंध और वैवाहिक कानूनों की समीक्षा
5 जुलाई प्रातःकालीन सत्र
मैं बार-बार लिखता रहा हूँ कि अनेक समस्याएँ सरकार के अनावश्यक हस्तक्षेप का बाय-प्रोडक्ट हैं और सरकार अगर किनारे हो जाए तो ये समस्याएँ अपने आप खत्म हो जाएँगी।
आजकल दिन-रात इस प्रकार की चर्चाएँ सामने आ रही हैं कि किसी महिला ने अपने पति को धक्का देकर मार दिया, किसी महिला ने अपने पति को नींद की गोली देकर मार दिया, किसी पति ने अपनी पत्नी की गर्दन काट दी, किसी पति ने अपनी पत्नी का गला घोंट दिया, किसी पति ने अपनी पत्नी को धोखा दे दिया। इस तरह की घटनाएँ दिन-रात सामने आती हैं, जिनमें पति-पत्नी के आपसी विश्वास कलंकित होते हैं।
इसके अतिरिक्त भी अनेक घटनाएँ बलात्कार की आती हैं, अनेक घटनाएँ धोखाधड़ी की आती हैं, जिनमें पत्नी अपने पति को धोखा देती है, पति पत्नी को धोखा देता है।
इन सारी घटनाओं का कारण है कि आपने विवाह की उम्र बढ़ा दी, आपने तलाक को कठिन कर दिया, आपने बलात्कार को बहुत अधिक गंभीर अपराध बना दिया। मैं लंबे समय से लिखता रहा हूँ कि ये सारे प्रयास गलत हैं। आप बलात्कार की परिभाषा बदलें। मैं मानता हूँ कि आपने बाल विवाह को इसलिए रोका कि जन्म दर कम हो, लेकिन अब जन्म दर की समस्या खत्म हो गई है। अब बाल विवाह कानून खत्म कर दीजिए। तलाक को स्वतंत्र कर दीजिए। दहेज कानून हटा दीजिए। इस प्रकार के कानून अगर आप समाप्त कर देंगे तो ये दिन-रात होने वाली पति-पत्नी के बीच टकराव की घटनाएँ अपने आप कम हो जाएँगी।
मेरा स्पष्ट मत है कि सरकार को सिर्फ संविधान-शास्त्र ही नहीं, समाजशास्त्र पर भी राय लेनी चाहिए। सामाजिक नियम बनाने के लिए कानून की तुलना में समाजशास्त्रियों का महत्व अधिक है।
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