धर्म और राजनीति: स्पष्ट पृथक्करण ही लोकतंत्र की सुरक्षा
मैं बहुत लंबे समय से लगातार लिखता रहा हूं कि धर्म और राजनीति को बिल्कुल अलग-अलग होना चाहिए। धर्म को राजनीति पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण करना चाहिए, प्रत्यक्ष नहीं। जब धर्म संगठन का रूप ले ले, तब तो धर्म को राजनीति पर किसी भी तरह का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप करना ही नहीं चाहिए।
दुर्भाग्य से बुद्ध काल से इसकी शुरुआत हुई और इस्लाम में इसे सबसे अधिक गंभीर खतरा बना दिया। दुनिया के अनेक देशों में राज्य धर्म के आधार पर कानून बनाता है। पाकिस्तान इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहां ईशनिंदा सरीखे गंदे कानून भी बने हुए हैं।
लेकिन दुर्भाग्य से भारत में भी पंजाब ऐसी शुरुआत कर रहा है। धर्म के आधार पर कोई भी कानून बनना ही नहीं चाहिए, लेकिन आपने देखा होगा कि किस तरह पंजाब के मुख्यमंत्री धर्म के आधार पर कानून बनाते-बनाते धार्मिक मामले में ही फंस गए हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करना चाहिए। जिस भालू को पंजाब के मुख्यमंत्री कंबल समझकर ओढ़ रहे थे, उस भालू ने अब इन्हें पकड़ लिया है और यह बेचारे छटपटा रहे हैं।
मैं भारत सरकार को भी सलाह देता हूं कि वह इस प्रकार हिंदू राष्ट्र के नाम पर राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करने वालों से सावधान रहे। धर्म का राजनीति में कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए; उसे सिर्फ सलाहकार की भूमिका तक रहना चाहिए।
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