जंतर-मंतर से मिली रिपोर्ट: आंदोलन की ज़मीनी हकीकत
मैंने जंतर-मंतर पर हो रहे अभिजीत दीपक के कॉकरोच पार्टी के आंदोलन की विस्तृत जानकारी प्राप्त की, क्योंकि भारत को छोड़कर शेष सारी दुनिया में इस आंदोलन की व्यापक चर्चा हो रही है। मैं स्वयं तो जंतर-मंतर नहीं जा सका, लेकिन अपने कुछ प्रमुख मित्रों को जंतर-मंतर की जानकारी लेने के लिए भेजा और उन सबकी रिपोर्ट के आधार पर मैं यह समझा कि वहाँ लगभग 200 लोग रहते हैं। इनमें कई लोग दिन-रात रहते हैं, कई लोग आते हैं और चले जाते हैं। कुछ लोग खाना खाने के समय पर आ जाते हैं। आंदोलनकारियों को खर्च करने में किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं आ रही है। पैसा कहाँ से आ रहा है, यह अभी तक साफ नहीं है।
आंदोलन के बारे में यह बात भी स्पष्ट हुई कि राहुल गांधी से निराश अरविंद केजरीवाल और कम्युनिस्ट पार्टी ने मिलकर इस आंदोलन की रूपरेखा बनाई। कम्युनिस्ट पार्टी सोनम वांगचुक को राहुल गांधी की तुलना में आगे करना चाहती है, जिससे अरविंद केजरीवाल भी सहमत हैं। लेकिन अरविंद केजरीवाल ने दीपक की पार्टी को इसके साथ जोड़ दिया।
सच बात यह है कि आंदोलन की योग्यता वांगचुक में तो है, दीपक तो इसके लिए बिल्कुल ही अयोग्य है, लेकिन दीपक की पार्टी का वांगचुक के लिए उपयोग किया गया।
कम्युनिस्ट पार्टी में बड़ी मात्रा में लोग राहुल गांधी के नेतृत्व के पक्षधर हैं, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी का उच्च नेतृत्व वांगचुक के पक्ष में है। यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल और कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता इस आंदोलन में भाषण देने के लिए आ रहे हैं, लेकिन दोनों समूहों के सामान्य कार्यकर्ता आंदोलन में नहीं जुड़ रहे हैं। सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही है।
मुझे ऐसी उम्मीद दिखती है कि अन्य कम्युनिस्ट आंदोलनों की तरह यह आंदोलन भी वर्षों चलता रहेगा, जो न पूरी तरह मरेगा और न जिंदा रहेगा। एक औपचारिकता चलती रहेगी और फिर किसी नए आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की जाएगी।
दुनिया भर के मोदी-विरोधी लोग इस आंदोलन पर बहुत नजर लगाए हुए थे और अभी भी उन्हें पूरी निराशा नहीं हुई है, लेकिन भारत के आम लोग इस आंदोलन का अंतिम परिणाम अच्छी तरह समझ चुके हैं।
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