जंतर-मंतर विवाद: विपक्ष की रणनीति पर उठते सवाल
2 दिन पहले जंतर-मंतर पर जो कुछ भी हुआ, वह अप्रत्याशित था। एकाएक वहाँ बहुत भीड़ इकट्ठी हुई और जो कुछ हुआ, वह आप लोगों को मालूम है। लेकिन अब उसकी कई परतें खुल गई हैं। यह साफ हुआ है कि इस पूरे घटनाक्रम में अरविंद केजरीवाल एक खिलाड़ी के रूप में स्थापित हुए हैं।
वहाँ आने वाली अधिकांश भीड़ में या तो दलित नेता चंद्रशेखर के लोग थे अथवा अरविंद केजरीवाल द्वारा गुप्त रूप से की गई तैयारी के कार्यकर्ता। उस पूरी भीड़ में सीजेपी, सोनम वांगचुक अथवा अन्य विपक्षी दलों के लोगों की संख्या बहुत कम थी। चंद्रशेखर रावण की तुलना में भी अरविंद केजरीवाल की योजना के अंतर्गत आए हुए लोग अधिक थे।
अरविंद केजरीवाल की यह योजना पूरी तरह नेपाल सरीखे बदलाव का एक गंभीर प्रयत्न थी, लेकिन इतनी गंभीर और गुप्त तैयारी के बाद भी यह योजना सफल नहीं हो सकी। इसका मुख्य कारण यह था कि इसमें अन्य विपक्षी दलों की कोई योजना नहीं थी। खासकर यह सारी योजना सरकार के खिलाफ न बनाकर राहुल गांधी के खिलाफ बनाई गई थी। अर्थात् अरविंद केजरीवाल अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी को किनारे करना चाहते थे।
दूसरी बात यह भी थी कि भारत सहित पूरी दुनिया के कम्युनिस्ट दो भागों में बँट गए थे। एक भाग ऐसा था जो अरविंद केजरीवाल की योजना का समर्थक था और दूसरा भाग ऐसा था जो राहुल गांधी का समर्थक था। यही कारण है कि यह योजना पूरी तरह से असफल हो गई। न कहीं गोली चली, न किसी की मृत्यु हुई और सारा प्लान औपचारिक तरीके से समाप्त हो गया।
अब राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल का यह संघर्ष दो स्थानों पर केंद्रित हो गया है। जहाँ अरविंद केजरीवाल पूरी तरह जंतर-मंतर का उपयोग कर रहे हैं, वहीं राहुल गांधी संसद का उपयोग कर रहे हैं। दोनों के बीच के संघर्ष के दौरान सरकार निष्कंटक बनी हुई है। भारत की जनता को यह समझ में नहीं आ रहा है कि इस लड़ाई में भारत सरकार की भूमिका क्या है।
जंतर-मंतर की घटना ने यह अनुमान बहुत मजबूत कर दिया है कि वह शुद्ध तख्तापलट का एक प्रयोग था, जो नेपाल सरीखा दोहराया जा रहा था। इस तख्तापलट की योजना में किसी भी रूप में न दीप के. का कोई योगदान था, न सोनम वांगचुक का। इन दोनों को इस योजना के बारे में कुछ पता ही नहीं था।
हो सकता है कि इस योजना में अरविंद केजरीवाल के साथ कुछ विदेशियों का हाथ हो। इस योजना में अरविंद के अतिरिक्त अन्य किसी विपक्षी दल का कोई हाथ नहीं था, भले ही वे लोग परिस्थितिवश इस कार्य में शामिल हो गए हों, लेकिन सारी योजना एक व्यक्ति तक केंद्रित थी।
इस योजना को असफल करने में दिल्ली पुलिस का बहुत बड़ा योगदान रहा है। पुलिस वालों ने जिस तरह मार खाई, जिस तरह संतुलित बल प्रयोग किया, किसी भी एक व्यक्ति को मरने नहीं दिया, एक भी गोली नहीं चलाई और किसी को संसद में घुसने नहीं दिया, यह वास्तव में दिल्ली पुलिस की कार्यकुशलता ही मानी जानी चाहिए। अन्यथा कई सांसदों ने तो वहाँ भयभीत होना शुरू कर दिया था।
यह भी संभव है कि दो दिन पहले अमित शाह को इस तख्तापलट का कुछ आभास हो गया हो और उन्होंने तत्काल पुलिस बल में बहुत बड़ा बदलाव किया हो। कोई भी संभावना हो सकती है, लेकिन तख्तापलट की यह योजना पूरी तरह असफल हो गई और भारत की जनता ने लोकतंत्र को धन्यवाद दिया।
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