भारत में शंकराचार्य का प्रश्न अब अत्यंत विवादास्पद हो गया है।

24 जनवरी : प्रातःकालीन सत्र

भारत में शंकराचार्य का प्रश्न अब अत्यंत विवादास्पद हो गया है। दुनिया में हिंदू धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है जो मान्यता पर आधारित है और मान्यताओं के बल पर ही चलता है, न कि व्यवस्था पर। धर्म कोई प्रशासनिक व्यवस्था नहीं देता, न ही अनुशासन थोपता है।

पिछले लंबे समय से हम यह देख रहे हैं कि भारत में शंकराचार्य को एक धार्मिक मार्गदर्शक के स्थान पर एक प्रकार के व्यवस्थापक के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा। स्वामी स्वरूपानंद ने हिंदुओं के लिए यह व्यवस्था देने का प्रयास किया कि साईं मंदिर अपवित्र हैं और उनका बहिष्कार किया जाना चाहिए, किंतु यह व्यवस्था हिंदुओं की मान्यता नहीं बन सकी।

हिंदुत्व की सुरक्षा और विस्तार में शंकराचार्य की भूमिका धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई। इसका परिणाम यह हुआ कि अनेक नए शंकराचार्य सामने आने लगे, जिन्हें संघ का समर्थन प्राप्त था, और ऐसे शंकराचार्य समाज में स्थापित भी होने लगे।

यह भी स्पष्ट होता गया कि शंकराचार्य की पारंपरिक प्रणाली के स्थान पर संघ द्वारा दी जा रही परंपरा ही हिंदुत्व की सुरक्षा और विस्तार में अधिक सहायक सिद्ध हो सकती है। अन्यथा शंकराचार्य की परंपरा, वर्तमान परिस्थितियों में, हिंदुत्व को आगे बढ़ाने के बजाय पीछे ले जाने का कारण बन सकती है।

इसी पृष्ठभूमि में स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद ने इस संघर्ष को और आगे बढ़ाकर एक बड़ा खतरा मोल ले लिया है। मेरे विचार से यह खतरा केवल अभिमुक्तेश्वरानंद तक सीमित नहीं है, न ही किसी एक शंकराचार्य तक; बल्कि पूरी शंकराचार्य प्रणाली ही संकट में आ गई है।

अब यह प्रश्न सामने खड़ा हो गया है कि क्या हम केवल परंपराओं के सहारे आगे बढ़ते हुए स्वयं को समाप्त कर लें, या नई परिस्थितियों के अनुरूप कुछ नई मान्यताओं और व्यवस्थाओं की स्थापना करें। हिंदुओं का बहुमत अब परंपराओं में सुधार या परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। मैं भी इस विचार से सहमत हूँ।

मेरा भी मानना है कि अभिमुक्तेश्वरानंद को अपनी नीतियों में परिवर्तन करना चाहिए। हिंदुत्व को सुरक्षा और विस्तार के लिए व्यावहारिक नीतियों की आवश्यकता है, न कि रूढ़िवाद की।