कानूनों का जाल और नागरिकों पर राज्य का नियंत्रण

समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिए राज्य किस प्रकार की योजनाएँ बनाता है, इस विषय पर हम लगातार चर्चा कर रहे हैं। इसमें एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राज्य समाज को लोकतांत्रिक तरीके से नियंत्रित रखने के लिए इतने अधिक कानून बना देता है कि राज्य का कोई भी नागरिक उन सभी कानूनों का पूर्ण रूप से पालन कभी कर ही नहीं सकता।

यदि कोई नागरिक सभी कानूनों का पालन कर ले, तो वह सिर उठाकर यह कह सकता है कि वह अपराधी नहीं है, और यही भावना राज्य के लिए खतरा बन सकती है। इसलिए राज्य अक्सर यह प्रयास करता है कि अधिक से अधिक कानून बनाकर प्रत्येक नागरिक को किसी न किसी रूप में अपराधबोध से ग्रसित कर दिया जाए।

राज्य यह भी कोशिश करता है कि केवल कानून का उल्लंघन ही नहीं, बल्कि कई बार गैर-कानूनी और अनैतिक व्यवहार की परिभाषाओं को भी इस प्रकार बदल दिया जाए कि वे सब अपराध की श्रेणी में आ जाएँ। इस प्रकार कानून, अनैतिकता और अपराध—इन तीनों को एक ही दायरे में खड़ा कर दिया जाता है।

स्वाभाविक है कि आपको भारत में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो पूरी तरह नैतिक भी हो और सभी कानूनों का पूर्ण रूप से पालन भी करता हो। इससे राज्य को यह सुविधा मिल जाती है कि वह प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अपराधबोध की भावना उत्पन्न कर सके।

राज्य की इन नीतियों का अपराधी भी अप्रत्यक्ष रूप से स्वागत करते हैं। जब कोई सामान्य व्यक्ति किसी डकैत या अपराधी पर आरोप लगाता है, तो वह अपराधी पलटकर यह कह देता है कि तुम टैक्स चोर हो, तुम भी बड़े डकैत हो, तुम देशद्रोही हो। तब वह साधारण व्यक्ति, जो किसी छोटे-से कानून उल्लंघन का दोषी हो सकता है, सिर झुका लेता है और अपराधी का सिर ऊँचा बना रहता है।

इस प्रकार राज्य और अपराधी—दोनों के उद्देश्य किसी न किसी रूप में पूरे हो जाते हैं, और अंततः सबसे अधिक नुकसान उस सामान्य, ईमानदार व्यक्ति को उठाना पड़ता है जिसका सिर झुक जाता है।

इस विषय पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।