मैंने आज एक विदुषी लेखिका क्षमा शर्मा का लेख पढ़ा, जिसमें उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया है कि
मैंने आज एक विदुषी लेखिका क्षमा शर्मा का लेख पढ़ा, जिसमें उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया है कि वर्तमान समय में वृद्ध माता-पिता अथवा सास-ससुर अत्यधिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं। इस संदर्भ में तेलंगाना सरकार द्वारा एक कानून बनाने की तैयारी की जा रही है, जिसके अंतर्गत वृद्ध माता-पिता के भरण-पोषण हेतु वेतन से 10 प्रतिशत कटौती का प्रावधान किया जा सकता है। इस प्रस्तावित कानून की प्रशंसा भी क्षमा जी ने की है। देश के अन्य अनेक लेखक भी वृद्धों के समर्थन में अपनी आवाज़ उठा रहे हैं।
मैं इस आवाज़ के विरुद्ध नहीं हूँ, किंतु मैं उस सोच के विरुद्ध अवश्य हूँ जिसमें एक ओर युवा सशक्तिकरण का नारा दिया जाता है और दूसरी ओर वृद्धों पर अत्याचार की बात कही जाती है। इन दोनों कथनों के बीच स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है, फिर भी ऐसे परस्पर विरोधी बयान समाज में सामान्य रूप से दिए जाते हैं।
कभी कहा जाता है कि युवा महिलाओं को कराटे सीखना चाहिए, कभी नारा लगता है—“मैं लड़की हूँ, मैं लड़ सकती हूँ”, और फिर यह भी कहा जाता है कि युवा महिलाएँ और पुरुष वृद्धों पर अत्याचार कर रहे हैं। समझ में नहीं आता कि समाज में इस प्रकार की उलटी-सीधी और परस्पर टकराती हुई बातें क्यों उठाई जा रही हैं।
मेरे विचार से युवा सशक्तिकरण और वृद्धों पर अत्याचार—दोनों ही प्रकार के नारे मूल रूप से गलत दिशा में ले जाने वाले हैं। इस विषय में सरकार को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। चाहे युवा हो या वृद्ध, महिला हो या पुरुष—सभी को समान अधिकार मिलने चाहिए।
यदि वास्तव में समस्या का समाधान करना है, तो सरकार को यह घोषणा करनी चाहिए कि जो भी व्यक्ति परिवार में संकट की स्थिति में है, वह परिवार से अलग होकर सरकार के आश्रित हो सकता है। उसका भरण-पोषण सरकार सुनिश्चित करेगी—चाहे वह महिला हो या पुरुष, युवा हो या वृद्ध, ब्राह्मण हो या दलित, कोई भी क्यों न हो।
मैं पुनः यह निवेदन करता हूँ कि युवा और वृद्ध के बीच टकराव उत्पन्न करने के प्रयास समाज के लिए घातक सिद्ध होंगे।
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