नई व्यवस्था में समझौता न्याय से अधिक महत्वपूर्ण

19 में प्रातःकालीन सत्र। नई समाज व्यवस्था में हम न्याय की पश्चिम से आई हुई परिभाषा और तरीका, दोनों को बदल देंगे। हम पुरानी परिभाषा की “चाहे कितने भी अपराधी छूट जाएं, लेकिन किसी निरपराध को दंड न हो” को बदल देंगे। हम इसे बदलकर यह करेंगे कि न कोई अपराधी बचे और न कोई निरपराध दंडित हो।

इसी तरह हम पुरानी न्याय प्रक्रिया को भी बदल देंगे। पुलिस जिस व्यक्ति को अपराधी सिद्ध करेगी और पुलिस तथा ग्राम सभा मिलकर जो दंड देगी, वह दंड यदि स्वीकार नहीं है तो व्यक्ति न्यायालय में अपील कर सकता है। अपने को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी उस अपीलकर्ता की होगी। यदि कोई अनावश्यक अपील करेगा तो सारा खर्च उस व्यक्ति को वहन करना होगा। इस तरह हम न्यायालय को महंगा कर देंगे।

हम प्रयास करेंगे कि न्यायपालिका के पास कम से कम मामले जाएं। हम यह भी प्रयास करेंगे कि न्याय की तुलना में समझौते को अधिक महत्व दिया जाए। मैं कई मामले ऐसे देख रहा हूं कि उच्च न्यायालय कोई निर्णय देता है, सर्वोच्च न्यायालय उसे पलट देता है। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भी डबल बेंच में पलट जाता है। इस तरह न्यायालय में भी आमतौर पर एकता नहीं होती। इसलिए लोग बाल की खाल निकालने के लिए हर मामले में न्यायालय का सहारा लेने लगे हैं।

हम इस बाल की खाल निकालने वाली परिपाटी को बदल देंगे। अपील करना खिलवाड़ नहीं, बल्कि एक गंभीर मामला होगा। इस तरह नई व्यवस्था में हम न्याय की तुलना में समझौते को अधिक महत्वपूर्ण बनाएंगे।