सिद्धांत और व्यवहार के बीच संतुलन आवश्यक
अगस्त प्रातः कालीन सत्र। हम गांधी को मानने वाले हैं। हम यह मानते हैं कि वर्ग-विद्वेष सबसे अधिक घातक है। हम यह भी मानते हैं कि सिद्धांत और व्यवहार के बीच एक तालमेल होना चाहिए। यदि सिद्धांत अधिक हावी होंगे तो अराजकता पैदा हो जाएगी और यदि व्यवहार अधिक हावी होगा, चरित्र-पतन होगा। इसलिए दोनों के बीच संतुलन तो होना ही चाहिए।
सैद्धांतिक रूप से हम किसी भी प्रकार के आरक्षण के विरुद्ध हैं, क्योंकि आप इस पर गंभीरता से सोचिए, यदि कुछ महिलाओं को आरक्षण देकर अन्य योग्य पुरुषों को मजदूरी करने में लगा दिया जाए अथवा कुछ योग्य सवर्णों को हम मजदूरी में लगा दें, तो यहाँ गंभीर प्रश्न पैदा होता है। इस फेरबदल से हमारे देश को क्या लाभ होगा और समाज को क्या लाभ होगा? इस प्रश्न का उत्तर न किसी ने दिया है, न किसी के पास देने की क्षमता है। हम अगर समाज और देश की चिंता कर रहे हैं तो हमें किसी न किसी तरीके से आरक्षण को समाप्त करना ही होगा, लेकिन हम सरकार से यह कोई माँग नहीं कर रहे हैं, क्योंकि यह हमारा सैद्धांतिक पक्ष है, सामाजिक पक्ष है। सरकार इसके व्यावहारिक पक्ष के साथ तुलना करके इस संबंध में सोच सकती है, लेकिन आरक्षण को लंबे समय तक रखना अच्छा कार्य नहीं है।
आरक्षण के नाम पर कोई समूह ब्लैकमेल करे, यह भी अच्छी बात नहीं है, चाहे वह अंबेडकरवादी हों या ब्राह्मणवादी। भले ही परिस्थितियों के अनुसार सरकार ऐसा विलंब करने को मजबूर हो। मेरा यह सुझाव है कि सिद्धांत और व्यवहार के बीच तालमेल बिठाकर सरकार जो निर्णय लेगी, हम उसके साथ हैं, लेकिन हम सैद्धांतिक धरातल पर आरक्षण के विरुद्ध रहेंगे।
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