यूजीसी विवाद से जातीय संघर्ष नहीं, सर्वजाति समाज की ओर

अभी कुछ ही महीने बीते हैं, जब भारत सरकार से यूजीसी के मामले में एक गलती हो गई थी। हम लोग भी उस गलती से चिंतित थे, लेकिन दो दिन बीतते-बीतते ही सुप्रीम कोर्ट ने उस गलती को सुधार दिया और देश एक नए टकराव से बच गया। फिर भी कुछ ब्राह्मणों ने इस यूजीसी के मुद्दे को बढ़ाने की कोशिश की और थोड़े दिनों तक जिंदा रखा। लेकिन भारत का आम ब्राह्मण इस बात को समझ गया कि अब यह आज का चिल्लाना अनावश्यक है, क्योंकि यदि यूजीसी की बात को आगे बढ़ाया जाएगा तो हम ब्राह्मणों को ही इसका अधिक नुकसान होगा।

सच बात यह है कि ब्राह्मण वर्ग की अधिकांश जीविका शेष समाज पर निर्भर करती है। ब्राह्मण समाज के दान से ही आमतौर पर चलता है। कुछ ब्राह्मणों को छोड़कर शेष ब्राह्मण समाज से दूरी नहीं बना सकते। दूसरी बात यह भी महसूस की गई कि स्वतंत्रता के पहले कुछ जातियों के साथ गलतियाँ जरूर हुई थीं। अब दोबारा उस प्रकार की गलती को आगे बढ़ाना ठीक नहीं है। यही मानकर अधिकांश ब्राह्मणों ने इस आंदोलन से अपने को दूर कर लिया। यह बात भी साफ दिखने लगी कि इस आंदोलन को विपक्ष, मुसलमान और कम्युनिस्ट ज्यादा हवा दे रहे हैं, क्योंकि उनका उद्देश्य वर्ग संघर्ष है, वर्ग समन्वय नहीं। मुझे खुशी है कि भारत के अधिकांश ब्राह्मणों ने इस आंदोलन से अपने को किनारा कर लिया और अब दो-चार पेशेवर आंदोलनकारी अथवा अधिक कट्टरवादी ब्राह्मण ही आगे-आगे चिल्ला रहे हैं। अन्यथा सारा देश इस विषय को समझ गया है। हमें जाति समाज नहीं, बल्कि सर्वजाति समाज के विषय में सोचना चाहिए और इसका नेतृत्व हम ब्राह्मणों को ही करना चाहिए।

कई साथियों ने अपने विचार व्यक्त किए। मैं आपको साफ कर दूँ कि मैं बचपन से ही पूरी तरह आरक्षण का विरोधी रहा, लेकिन मेरे आरक्षण विरोध के साथ दो बातें जुड़ी हुई हैं। पहली बात कि सरकारी कर्मचारियों का वेतन और सुविधा अन्य कर्मचारियों के समान ही हो। उन्हें बाजार दर पर ही वेतन दिया जाए, विशेष सुविधा नहीं। दूसरा, कृषि उत्पादन पर लगने वाले सब प्रकार के टैक्स समाप्त कर दिए जाएँ। यदि जरूरी हो तो डीजल, पेट्रोल, बिजली का मूल्य बढ़ाया जा सकता है। तीसरी बात कि सभी प्रकार के आरक्षण समाप्त कर दिए जाएँ, चाहे वह जाति आरक्षण हो या महिला आरक्षण हो। सबको अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार ही सब जगह कार्य मिले।

इन तीनों बातों से मैं हमेशा सहमत रहा और आज भी इसके पक्ष में हूँ। इस संबंध में मोहन भागवत, नरेंद्र मोदी तथा अन्य लोग भी धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहे हैं। लेकिन जो लोग ऐसा समझते हैं कि कुछ अंबेडकरवादी सारा माल-मलाई खा रहे हैं, उसमें सवर्ण का भी हिस्सा होना चाहिए, मैं इस लूट के माल में बँटवारे का पक्षधर न पहले था, न अब हूँ। मैं तो इस लूट को ही बंद करना चाहता हूँ।