वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्त्री-पुरुष संबंधों की तीन सांस्कृतिक धाराएँ
पुरुष-महिला संबंधों के संदर्भ में दुनिया में तीन अलग-अलग प्रकार की संस्कृतियाँ सक्रिय दिखाई देती हैं। Afghanistan ने हाल ही में महिलाओं की स्वतंत्रता पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यदि इस्लाम पर अंतरराष्ट्रीय दबाव न हो, तो कुछ स्थानों पर महिलाओं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक मानने की प्रवृत्ति और खुलकर सामने आ सकती है। अफगानिस्तान में इसकी शुरुआत दिखाई दे रही है।
दूसरी ओर, पश्चिमी देशों में महिलाओं को विशेष अधिकार देने और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने की एक व्यापक लहर चल रही है।
India को एक ऐसा देश माना जाता है जहाँ की पारंपरिक संस्कृति स्त्री और पुरुष के बीच मूलतः कोई भेद नहीं करती और दोनों को समान अधिकार प्रदान करने की बात करती है। भारतीय परिवार व्यवस्था में महिला कभी माँ, कभी बहन, कभी बेटी और कभी पत्नी के रूप में विभिन्न भूमिकाएँ निभाती है। यद्यपि समय और परिस्थिति के अनुसार उनकी भूमिकाएँ बदलती रहती हैं, परंतु मूल रूप से स्त्री और पुरुष के बीच किसी प्रकार का भेद स्वीकार नहीं किया जाता। परिवार के प्रत्येक सदस्य को सहभागी माना जाता है, केवल सहयोगी नहीं—चाहे वह महिला हो या पुरुष।
यह अलग बात है कि ऐतिहासिक कालखंडों में बाहरी प्रभावों के कारण महिलाओं की भूमिका को सहभागी के स्थान पर केवल सहयोगी के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी। वर्तमान समय में पश्चिमी विचारधाराओं का प्रभाव भी भारतीय समाज पर दिखाई दे रहा है, जिसके परिणामस्वरूप महिला सशक्तिकरण के नारे को एक अलग रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
दूसरी ओर, विश्व समुदाय अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति पर खुलकर विरोध दर्ज कराने में अपेक्षाकृत असहज दिखाई देता है।
मेरा सुझाव है कि पश्चिम और इस्लामी समाज—दोनों—भारतीय सांस्कृतिक दृष्टिकोण का अध्ययन करें, जिसमें स्त्री और पुरुष को सबसे पहले मनुष्य माना जाता है। दोनों के बीच किसी भी प्रकार का संवैधानिक या कानूनी भेद नहीं किया जाना चाहिए।
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