पाँच दिनों तक रामानुजगंज में बैठकर इस विषय पर गंभीर विचार-मंथन किया
25 फरवरी, प्रातःकालीन सत्र
हम लोगों ने पाँच दिनों तक रामानुजगंज में बैठकर इस विषय पर गंभीर विचार-मंथन किया कि साम्यवाद और इस्लामिक राजनीतिक व्यवस्थाओं जैसी केंद्रीकृत एवं विचारधारात्मक संरचनाओं के स्थान पर एक अधिक संतुलित और मानव-केंद्रित व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। हमारा मत है कि वर्तमान विश्व की लोकतांत्रिक व्यवस्था अनेक कमियों से ग्रस्त है और अपने अपूर्ण स्वरूप के कारण तानाशाही तथा सांप्रदायिक प्रवृत्तियों का प्रभावी ढंग से सामना करने में कई बार असमर्थ दिखाई देती है।
इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हमने यह निर्णय लिया है कि विश्व समुदाय के समक्ष एक आदर्श लोकतंत्र की रूपरेखा प्रस्तुत की जाए। हमारा विश्वास है कि यही आदर्श लोकतंत्र साम्यवादी तथा कठोर धार्मिक-राजनीतिक विचारधाराओं के विकल्प के रूप में खड़ा हो सकता है। साथ ही, यही व्यवस्था राजनीति में बढ़ते धन और शक्ति के असंतुलित प्रभाव का भी प्रभावी समाधान प्रस्तुत कर सकती है।
हमारा विचार है कि इस नई राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण केवल किसी एक देश या समूह द्वारा नहीं, बल्कि विश्व समाज की सहभागिता से होना चाहिए। इसकी वैचारिक और संगठनात्मक शुरुआत भारत से की जा रही है। इसी उद्देश्य से हमने देशभर में अपनी सक्रियता बढ़ाने की योजना बनाई है। पिछले छह महीनों से यह कार्य संस्थागत रूप से प्रारंभ हो चुका है, और अब हमारे कई साथी इसे और अधिक गति देने की तैयारी कर रहे हैं।
हम मानते हैं कि वर्तमान वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था आदर्श नहीं है। इसलिए दुनिया के सामने एक संतुलित, न्यायपूर्ण और सहभागी विकल्प रखा जाना आवश्यक है। इसी नई संवैधानिक व्यवस्था को हम “सहभागी लोकतंत्र” अथवा “लोक स्वराज” के नाम से आगे बढ़ा रहे हैं।
मेरे विचार से सहभागी लोकतंत्र या लोक स्वराज ही वर्तमान विश्व की जटिल समस्याओं का एक सशक्त और दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत कर सकता है।
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