शिक्षा और ज्ञान का बिगड़ता संतुलन: नई सोच की आवश्यकता

वर्तमान समाज व्यवस्था में पूरी दुनिया में, और विशेषकर भारत में, शिक्षा को बहुत अधिक महत्व दिया जा रहा है। शिक्षा को अत्यधिक महत्व देने के कारण एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई है—ज्ञान घटता जा रहा है। वास्तव में ज्ञान और शिक्षा के बीच का संतुलन बिगड़ गया है।

इसी कारण समाज में अधिकांश लोग शिक्षा प्राप्त करके केवल नौकरी करना चाहते हैं। जबकि ज्ञान व्यक्ति की निर्णय लेने की शक्ति को बढ़ाता है, क्योंकि ज्ञान में अनुभव निहित होता है। इसके विपरीत शिक्षा में अनुभव का अभाव होता है, इसलिए वह व्यक्ति को मुख्यतः नौकरी की ओर प्रेरित करती है।

अब समय आ गया है कि हम शिक्षा के वर्तमान पैटर्न को बदलने पर विचार करें और शिक्षा तथा ज्ञान को एक साथ जोड़कर देखें। इसका अर्थ यह है कि किसी भी बालक की बचपन में उसकी योग्यता की परीक्षा ली जाए, और उस परीक्षा के आधार पर उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए। उस दिशा में उसे केवल शिक्षा ही न दी जाए, बल्कि उससे संबंधित अनुभव भी प्राप्त करने का अवसर दिया जाए।

उदाहरण के लिए, जो बालक डॉक्टर बनना चाहता है, उसे प्रारंभ से ही चिकित्सा की पढ़ाई के साथ-साथ चिकित्सा संबंधी व्यवहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाए। इसी प्रकार जो किसान बनना चाहता है, उसे कृषि की शिक्षा के साथ-साथ खेत में काम करने का भी अवसर दिया जाए।

जब ज्ञान और शिक्षा दोनों एक साथ जुड़ेंगे, तब व्यक्ति केवल नौकरी की ओर नहीं जाएगा, बल्कि रोजगार और स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ेगा।

मेरे विचार से वर्तमान शिक्षा पद्धति में कई कमियाँ हैं, और उस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। हमें मिलकर एक ऐसी नई शिक्षा पद्धति पर विचार करना चाहिए, जिसमें शिक्षा और अनुभव दोनों का संतुलित समावेश हो।