शंकराचार्य स्वामी मुक्तेश्वरानंद जी जब से शंकराचार्य बने हैं, तब से
शंकराचार्य स्वामी मुक्तेश्वरानंद जी जब से शंकराचार्य बने हैं, तब से वे अनावश्यक रूप से अधिक बोलने लगे हैं और उनके आचरण में पहले जैसी गंभीरता दिखाई नहीं देती। ऐसा प्रतीत होता है कि शंकराचार्य का पद उनके भीतर विनम्रता बढ़ाने के बजाय अहंकार को ही पोषित कर रहा है। जो मन में आता है, वह बिना संयम के कह दिया जाता है।
हाल ही में संगम स्नान के अवसर पर भी उन्होंने बिना किसी ठोस कारण के विवाद खड़ा कर दिया। शंकराचार्य होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे पैदल चल ही नहीं सकते या उन्हें सदैव चाँदी के सिंहासन पर ही बैठाया जाए। यदि आप शंकराचार्य हैं, तो फिर इतनी विलासिता से मोह क्यों? क्या आप केवल पचास मीटर पैदल भी नहीं चल सकते?
अहंकारवश स्नान न करने की घोषणा कर देना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह समझना कठिन है कि आप संगम में स्नान करने जा रहे थे या किसी पर उपकार करने। जब भारत के करोड़ों श्रद्धालु आस्था के साथ वहाँ स्नान करने जाते हैं, कष्ट सहते हैं, तो इसका अर्थ यह है कि उनमें स्नान के प्रति गहरी श्रद्धा है—कष्ट के प्रति नहीं। और एक आप हैं, जो केवल कुछ दूरी पैदल चलने के कारण उस स्नान का त्याग कर रहे हैं।
इस सोच की मैं घोर निंदा करता हूँ। धर्म के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए; धर्म आपके पीछे नहीं चलता। शंकराचार्य जी के इस व्यवहार से मुझे गहरी निराशा हुई है।
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