गाजियाबाद के एक ढाबे में भोजन को अपवित्र करने जैसी घटना

भारत में मुसलमानों के एक वर्ग के व्यवहार को लेकर लंबे समय से गंभीर प्रश्न उठते रहे हैं। बार-बार यह देखा गया है कि जब किसी मुद्दे पर असंतोष पैदा होता है, तो न्यायालय या संवैधानिक प्रक्रियाओं का सहारा लेने के बजाय सड़क पर टकराव, हिंसा, पत्थरबाज़ी और बल प्रयोग की घटनाएँ सामने आती हैं। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती है और पुलिस या प्रशासन हस्तक्षेप करता है, तब वही पक्ष न्याय, मानवाधिकार और दया की अपील करता दिखाई देता है। यह व्यवहार अपने आप में एक विरोधाभास पैदा करता है, जो समाज और व्यवस्था—दोनों के लिए चिंता का विषय है।
न्याय की मांग तभी नैतिक बल प्राप्त करती है जब वह कानून और संविधान के दायरे में रखी जाए। यदि किसी समुदाय या उसके नेताओं को अपनी बात, अपनी संख्या या अपने तर्क पर विश्वास है, तो उसे न्यायालय, सरकार और समाज के समक्ष शांतिपूर्ण और वैधानिक ढंग से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। हिंसा का रास्ता अपनाकर और बाद में स्वयं को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करना न तो स्थायी समाधान देता है और न ही समाज में विश्वास पैदा करता है। दो विपरीत दिशाओं में एक साथ चलने का प्रयास अंततः कमजोरी और हानि ही उत्पन्न करता है।
पिछले वर्षों में शाहीन बाग, वक्फ कानून और राम मंदिर जैसे विषयों पर सार्वजनिक विमर्श के दौरान भी यह देखा गया कि कुछ नेताओं द्वारा अत्यधिक आक्रामक और अहंकारी भाषा का प्रयोग किया गया, जबकि समय बदलने पर वही स्वर दया और संरक्षण की मांग में बदल गया। यह स्थिति आत्ममंथन की मांग करती है। किसी भी समुदाय को यह स्पष्ट रूप से तय करना चाहिए कि वह न्याय संविधान और कानून के माध्यम से चाहता है या टकराव और अराजकता के रास्ते पर चलना चाहता है। दोनों विकल्पों को एक साथ अपनाने की मानसिकता ही समाज को कमजोर करती है।
इसी क्रम में हाल के वर्षों में सामने आई कुछ घृणित आपराधिक घटनाएँ भी चिंता बढ़ाती हैं। गाजियाबाद के एक ढाबे में भोजन को अपवित्र करने जैसी घटना हो या इससे मिलते-जुलते अन्य मामले—मुख्य प्रश्न केवल यह नहीं है कि अपराध हुआ, बल्कि यह है कि कोई व्यक्ति ऐसा करने का साहस क्यों करता है। इसका न तो कोई धार्मिक औचित्य समझ में आता है, न कोई सामाजिक या व्यावहारिक लाभ। किसी भी धर्म, विशेषकर इस्लाम, में भोजन के साथ छल या अपवित्रता की अनुमति नहीं है। इसलिए यह स्पष्ट है कि ऐसे कृत्य धर्म से नहीं, बल्कि विकृत मानसिकता और आपराधिक प्रवृत्ति से जुड़े हैं।
फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि ऐसी घटनाओं पर व्यापक और स्पष्ट सामाजिक निंदा खुलकर क्यों सामने नहीं आती। जब अपराध व्यक्ति का होता है, तब भी सामूहिक चुप्पी पूरे समुदाय के प्रति अविश्वास को जन्म देती है। इसका परिणाम यह होता है कि समाज के अन्य वर्गों में सावधानी और दूरी बढ़ती जाती है। सावधानी सुरक्षा तो दे सकती है, लेकिन यह यह नहीं बता पाती कि समस्या की जड़ क्या है और उसका समाधान कैसे निकले।
आवश्यक है कि इस पूरे विषय पर भावनाओं और आरोपों के बजाय ठंडे दिमाग से, तथ्य और तर्क के साथ चर्चा हो। हिंसा, छल और कानून-विरोधी आचरण चाहे किसी भी व्यक्ति या समूह से जुड़ा हो, उसकी स्पष्ट निंदा होनी चाहिए और कानून के अनुसार कठोर दंड मिलना चाहिए। साथ ही, धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह समाज को स्पष्ट संदेश दे कि ऐसी प्रवृत्तियाँ न स्वीकार्य हैं और न ही किसी धर्म या समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं।
अंततः भारत किसी धर्म का विरोधी नहीं है, लेकिन अराजकता और कानून-विहीनता का विरोधी अवश्य है। न्याय न बल से मिलता है, न धमकी से—न्याय केवल कानून, संवाद और पारदर्शिता से मिलता है। इसी मार्ग पर चलकर ही कोई भी समुदाय स्वयं को और देश को मजबूत बना सकता है।