इसी क्रम में एक और समाज-विभाजक धारणा किसान, व्यापारी और मजदूर के बीच भी जानबूझकर खड़ी की गई है।
हम समाज को तोड़ने वाली अनेक धारणाओं—धर्म, जाति, भाषा, लिंग, गरीब-अमीर, युवा-वृद्ध—पर पहले ही चर्चा कर चुके हैं। इसी क्रम में एक और समाज-विभाजक धारणा किसान, व्यापारी और मजदूर के बीच भी जानबूझकर खड़ी की गई है। सामान्यतः यह बताया जाता है कि किसान, व्यापारी और मजदूर तीन बिल्कुल अलग-अलग वर्ग हैं, जबकि गहराई से देखने पर यह विभाजन वास्तविकता से अधिक कृत्रिम प्रतीत होता है।
भारत में बहुत कम ऐसे परिवार मिलते हैं जो केवल किसान, केवल व्यापारी या केवल मजदूर हों। अधिकांश परिवार मिश्रित स्वरूप के हैं। किसान परिवार का कोई सदस्य सरकारी नौकरी करता है, कोई छोटा-मोटा व्यापार करता है, खेती भी करता है और आवश्यकता पड़ने पर मजदूरी भी कर लेता है। अनेक किसान वर्ष के कुछ महीनों में खेती करते हैं और शेष समय मजदूरी करते हैं। दूसरी ओर, कई बड़े व्यापारी कर-बचाव के उद्देश्य से खेती को अपनाकर स्वयं को किसान सिद्ध करते हैं। इसी प्रकार, ऐसे नेता भी देखे जाते हैं जो राजनीति को ही पेशा बनाए रखते हैं, लेकिन स्वयं को किसान बताने में संकोच नहीं करते। वर्षों तक सीमाओं पर धरना देने वाले तथाकथित किसान नेताओं को वास्तविक किसान कहना भी अपने-आप में प्रश्न खड़े करता है।
इस स्थिति में यह तय करना कि कौन किसान है, कौन व्यापारी है और कौन मजदूर—एक अत्यंत जटिल और लगभग असंभव कार्य हो जाता है। इसलिए मेरे विचार से इस कृत्रिम भेद को समाप्त किया जाना चाहिए। यदि यह महसूस किया जाता है कि खेती घाटे का सौदा है, तो समाधान यह है कि कृषि उत्पादों का मूल्य बाजार में बढ़ने दिया जाए, जिससे किसान को स्वाभाविक रूप से लाभ मिले। यदि यह माना जाता है कि मजदूर के श्रम का मूल्य कम है, तो श्रम का मूल्य बाजार में बढ़ना चाहिए, ताकि मजदूर को उसका उचित प्रतिफल प्राप्त हो।
इसके विपरीत, किसानों को प्रत्यक्ष लाभ या विशेष पहचान देकर सहायता करना एक घातक प्रवृत्ति बन जाती है। यही कारण है कि अवसरवादी और धूर्त लोग समय-समय पर स्वयं को किसान या मजदूर घोषित कर लेते हैं और व्यवस्था का दुरुपयोग करते हैं। किसान, मजदूर और व्यापारी के बीच कृत्रिम भेदभाव समाज में वर्ग-विद्वेष को बढ़ावा देता है, न कि समाधान प्रस्तुत करता है।
इस प्रकार, यह विभाजन न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि सामाजिक एकता के लिए भी हानिकारक है। मैं इस भेदभाव के पूर्णतः विरुद्ध हूँ और मानता हूँ कि समाधान वर्ग पहचान में नहीं, बल्कि न्यायसंगत बाजार व्यवस्था और समान अवसरों में निहित है।
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