सड़क पर मामूली-सी बात पर हत्या हो जाना आम हो गया है।

आज का अख़बार पढ़ने पर लगभग हर पृष्ठ पर एक-दो हत्याओं का विवरण था। ये हत्याएँ केवल रायपुर के आसपास ही नहीं, बल्कि लगभग पूरे भारत के अख़बारों में प्रतिदिन छाई रहती हैं। कहीं ज़मीन के लिए हत्या, कहीं सेक्स के लिए, कहीं राजनीतिक कारणों से और कहीं धर्म के नाम पर। हत्या को अब एक सामान्य घटना की तरह देखा जाने लगा है। सड़क पर मामूली-सी बात पर हत्या हो जाना आम हो गया है। हत्या के मामलों में समाज पूरी तरह संवेदनहीन होता जा रहा है।
प्रश्न यह उठता है कि सरकारें इस स्थिति को लेकर आखिर कर क्या रही हैं। मेरा मानना है कि दुनिया में जितनी हत्याएँ सीधे अपराधियों द्वारा की जाती हैं, उससे कई गुना अधिक हत्याएँ धर्म के नाम पर होती हैं, और धर्म से भी कई गुना अधिक राजनीति के नाम पर। राजनीतिक हत्याएँ भी दो प्रकार की होती हैं—प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। अप्रत्यक्ष हत्याएँ वे होती हैं, जब सरकारें हत्या जैसे अपराधों की तुलना में बलात्कार या नशे को अधिक गंभीर अपराध के रूप में प्रस्तुत करने लगती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि समाज में हत्या का महत्व कम हो जाता है।
मैं आज तक यह नहीं समझ सका कि बाल बलात्कार या ड्रग्स रखना हत्या की तुलना में अधिक गंभीर अपराध कैसे हो गया। लेकिन हमारी नासमझ सरकारें, अपने दायित्वों से बचने और पिंड छुड़ाने के लिए, बाल बलात्कार या ड्रग्स को हत्या से अधिक गंभीर अपराध बना देती हैं।
अब समय आ गया है कि हम सरकार और धर्म पर अपने अंधविश्वास को कम करें। हमें सरकार पर यह दबाव बनाना चाहिए कि किसी भी प्रकार की सोच-समझकर की गई हत्या के मामले में मृत्यु दंड अनिवार्य हो, और ऐसे मृत्यु दंड का क्रियान्वयन घटना के छह महीने के भीतर अवश्य किया जाए। आप देखेंगे कि हत्याओं का “क्रेज” बहुत हद तक कम हो जाएगा।
बलात्कार और ड्रग्स की तुलना में हत्या को अधिक गंभीर अपराध मानना ही चाहिए।