व्यवस्था में दो अलग-अलग विभाग होते हैं—एक समाज व्यवस्था और दूसरी राज्य व्यवस्था।
23 जनवरी : प्रातःकालीन सत्र
व्यवस्था में दो अलग-अलग विभाग होते हैं—एक समाज व्यवस्था और दूसरी राज्य व्यवस्था। समाज व्यवस्था सामाजिक मान्यताओं के आधार पर समाज का निर्माण करती है, जबकि राज्य व्यवस्था मान्यताओं से हटकर व्यवस्था और अनुशासन को महत्व देती है।
मान्यता और व्यवस्था के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। मान्यताएँ केवल हृदय-परिवर्तन के माध्यम से ही समाज में स्थापित की जा सकती हैं, किसी व्यवस्था या शासन के माध्यम से नहीं। हृदय-परिवर्तन में अनुशासन की कोई भूमिका नहीं होती, जबकि व्यवस्था के निर्माण में मान्यताओं की नहीं, बल्कि अनुशासन की भूमिका होती है।
दुर्भाग्यवश हमारी राज्य व्यवस्था बिना इस भेद को समझे उच्च आदर्शवादी सिद्धांत गढ़ने लगी, जो व्यावहारिक नहीं थे, और उन्हें शासन के माध्यम से लागू करने का प्रयास करने लगी। यह पूरी तरह से गलत दिशा थी। इसका परिणाम यह हुआ कि धर्म व्यवस्था लगातार कमजोर होती चली गई और सामाजिक व्यवस्था को भी भारी क्षति पहुँची। राज्य व्यवस्था भी अपना मूल कार्य सही ढंग से नहीं कर पाई।
मेरा सुझाव यह है कि राज्य व्यवस्था को उच्च आदर्शवादी सिद्धांत बनाने से बचना चाहिए और स्वयं को केवल समाज में अनुशासन बनाए रखने तक सीमित रखना चाहिए। प्रवचन देना, उपदेश देना और हृदय-परिवर्तन करना राज्य व्यवस्था का कार्य नहीं है; यह धर्म व्यवस्था का कार्य है। धर्म और राज्य को कभी भी एक साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
नई व्यवस्था में हमारा प्रयास होगा कि इन दोनों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग रखा जाए।
Comments