मेरे बचपन से ही मुसलमानों के साथ मेरे अच्छे संबंध रहे हैं। बचपन से मैं बस इतना मानता था कि मुसलमानों को अपने घर के आसपास बसने नहीं देना चाहिए,

मेरे बचपन से ही मुसलमानों के साथ मेरे अच्छे संबंध रहे हैं। बचपन से मैं बस इतना मानता था कि मुसलमानों को अपने घर के आसपास बसने नहीं देना चाहिए, क्योंकि मुझे उनकी कामुक प्रवृत्तियाँ घातक प्रतीत होती थीं। इस विषय में मैं हमेशा सतर्क भी रहा। लेकिन धीरे-धीरे आगे चलकर मुझे मुसलमानों की सांप्रदायिक सोच को लेकर भी संदेह होने लगा। बाद में सार्वजनिक स्थानों पर थूकने जैसी घटनाओं ने मेरे मन में और अधिक नकारात्मक भावनाएँ पैदा कीं।
वर्तमान समय में मैं देख रहा हूँ कि मुसलमानों के प्रति आम लोगों का व्यवहार लगातार अधिक नफरतपूर्ण होता जा रहा है, और स्वयं मुसलमान भी इसे अनुभव कर रहे हैं। हाल ही में आपने ए. आर. रहमान का भाषण भी सुना होगा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्हें कई वर्षों से फिल्मों में नफरत का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति स्वाभाविक रूप से चिंताजनक है।
अभी हाल में बनारस में कई दुकानदारों ने बुर्का पहनने वाली महिलाओं के अपनी दुकानों में प्रवेश पर रोक लगा दी है। धीरे-धीरे देश के अन्य शहरों में भी यह आवाज उठ रही है कि बुर्का पहनने वाली महिलाओं को दुकानों में प्रवेश न दिया जाए। इसी प्रकार, अन्य स्थानों पर नौकरियों में भी मुसलमानों के प्रति अतिरिक्त सावधानी बरती जा रही है।
प्रश्न यह उठता है कि इसमें गलती मुसलमानों की है या हम लोगों की। मेरा अपना अनुभव है कि मुसलमानों को दूसरों पर आरोप लगाने से पहले अपनी कुछ गलतियों पर भी विचार करना चाहिए। हमने यह नहीं कहा कि आप किसी दूसरे की दुकान में बुर्का पहनकर जाएँ, हमने यह नहीं कहा कि आप थूक कर किसी को भोजन कराएँ, और न ही हमने यह कहा कि आपके युवक इस प्रकार अन्य लड़कियों पर बुरी नज़र डालें।
इसलिए मेरा भारत के मुसलमानों से निवेदन है कि वे यह भी आत्ममंथन करें कि उनके प्रति अन्य लोग इतने सतर्क क्यों होते जा रहे हैं। अब भारत उन्हें मेहमान के रूप में नहीं, बल्कि बराबरी के आधार पर साथ रखने के लिए तैयार है।