अमेरिका के राष्ट्रपति गिरफ्तार (नई समाज व्यवस्था)

नई समाज व्यवस्था पर विचार
हाल की घटनाओं ने एक बार फिर विश्व व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई कर वहाँ के राष्ट्रपति को गिरफ्तार किया जाना—क्या यह सही है या गलत—इस पर स्पष्ट मत बनाना कठिन हो गया है। व्यक्तिगत रूप से मैं साम्यवाद की तुलना में लोकतंत्र का समर्थक रहा हूँ। यह भी सत्य है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति साम्यवादी विचारधारा से जुड़े थे और चुनावी प्रक्रिया को अपेक्षित महत्व नहीं देते थे। फिर भी, वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए किसी एक पक्ष को पूरी तरह सही या गलत ठहराना सरल नहीं है।
आज की दुनिया मुख्यतः ताकत और धन के आधार पर संचालित हो रही है। रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया—दुनिया प्रभावी रूप से कुछ नहीं कर सकी। हमास ने इज़राइल पर आक्रमण किया—दुनिया असहाय दिखी। अब अमेरिका ने वेनेजुएला पर आक्रमण किया—और संभावना है कि दुनिया फिर कुछ नहीं कर पाएगी। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि क्या होना चाहिए था, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या दुनिया हमेशा ताकत और धन के नियम पर ही चलेगी, या हम किसी नई और न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था की कल्पना कर सकते हैं।
मेरा स्पष्ट मानना है कि वर्तमान विश्व व्यवस्था संतोषजनक नहीं है और इसमें परिवर्तन आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं की संरचना अब समयानुकूल नहीं रही। उनके स्थान पर संयुक्त मानव संघ जैसी एक नई वैश्विक व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए—जिसमें पूरी मानवता को केंद्र में रखा जाए।
इस नई व्यवस्था में तीन प्रमुख स्तंभ हों—
1. एक वैश्विक राष्ट्रपति,
2. एक संविधान सभा,
3. और एक कार्यकारी तंत्र।
ये तीनों मिलकर पूरी दुनिया के लिए न्याय, सुरक्षा और संतुलन की गारंटी दें।
आज की व्यवस्था में यह प्रश्न भी गंभीर है कि यदि देश को ही इकाई माना जाए, तो लगभग ढाई करोड़ की आबादी वाले वेनेजुएला और 140 करोड़ की आबादी वाले भारत को संयुक्त राष्ट्र में समान एक-एक वोट क्यों हों। यह व्यवस्था न्यायसंगत नहीं प्रतीत होती। इसलिए आवश्यक है कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में आबादी और व्यक्ति को मूल इकाई माना जाए, न कि केवल राष्ट्र को।
मेरे विचार में, व्यक्ति को इकाई मानकर एक ऐसी वैश्विक सामाजिक-राजनीतिक संरचना बनाई जानी चाहिए, जिसमें प्रत्येक राष्ट्र की भूमिका उसकी जनसंख्या और मानवीय योगदान के अनुसार निर्धारित हो। केवल इसी प्रकार एक अधिक संतुलित, न्यायपूर्ण और मानव-केंद्रित विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ा जा सकता है।