व्यक्ति और समाज के संबंध इतने जटिल और उलझे हुए हैं
दुनिया में व्यक्ति और समाज के संबंध इतने जटिल और उलझे हुए हैं कि उन्हें पूरी तरह सुलझाकर समझाना अत्यंत कठिन कार्य है। फिर भी, कठिन होने के बावजूद हमें इसका कोई सरल और व्यावहारिक मार्ग अवश्य निकालना होगा, क्योंकि हम हमेशा के लिए इस उलझन में फँसे नहीं रह सकते। प्राकृतिक रूप से यह सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर स्वतंत्र रूप से निर्णय करने की एक क्षमता होती है। इसी निर्णय-क्षमता को हम समझदारी कहते हैं। किंतु वर्तमान समय में यह स्वतंत्र निर्णय-क्षमता लगातार कम होती जा रही है। इसका प्रमुख कारण यह है कि धर्म और राज्य—दोनों ही—व्यक्ति की स्वतंत्र निर्णय प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप करने लगे हैं। यह भी एक स्वाभाविक तथ्य है कि कोई भी कार्य करने से पहले व्यक्ति उस कार्य के विषय में स्वयं निर्णय करता है और उसी निर्णय के अनुरूप कार्य करता है। इसलिए निर्णय लेना उसी व्यक्ति का अधिकार और दायित्व है जो उस कार्य को करने जा रहा है। दुर्भाग्यवश, यही निर्णय-क्षमता आज कमजोर होती जा रही है।
इसी कारण मेरा वर्तमान समय में स्पष्ट सुझाव है कि व्यक्ति की समझदारी को बढ़ाया जाना चाहिए। और समझदारी बढ़ाने का सबसे प्रभावी उपाय यही है कि व्यक्ति की निर्णय-क्षमता पर धर्म और राज्य का हस्तक्षेप न्यूनतम किया जाए। राज्य को केवल उसी स्थिति में हस्तक्षेप करना चाहिए, जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा पहुँचा रहा हो। वहीं, धर्म को अपनी सीमाओं के भीतर रहना चाहिए। धर्म का कार्य केवल मार्गदर्शन देना है; वह आदेश देने वाला तंत्र नहीं बन सकता।
मेरे विचार से आज धर्म और राज्य—दोनों ही—अपनी मूल भूमिका से भटककर गलत दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए मैं राज्य और धर्म, दोनों से निवेदन करता हूँ कि वे अपने अनावश्यक कानूनों और नियमों को समाप्त करें तथा व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की वास्तविक स्वतंत्रता प्रदान करें।
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