संगत बनाम स्वतंत्रता: नई समाज व्यवस्था की दिशा

11 अप्रैल प्रातः कालीन सत्र – समान नागरिक संहिता पर चर्चा।

मैं इस बात से सहमत हूँ कि व्यक्ति के विकास में शिक्षा की पर्याप्त भूमिका रहती है। जिस समय भारत स्वतंत्र हुआ था, उस समय सरकारी कार्यों के लिए भी पढ़े-लिखे लोग नहीं मिल रहे थे। इसलिए शिक्षा को अत्यधिक महत्व दिया गया। सरकारी कर्मचारियों के वेतन भी अधिक किए गए, क्योंकि उस समय देश में श्रम की तुलना में शिक्षा बहुत कम थी।

लेकिन वर्तमान भारत में शिक्षित लोगों ने श्रम के शोषण को अपना अधिकार मान लिया है। उन्होंने मिलकर यह धारणा बना दी है कि शिक्षा का महत्व बहुत अधिक है, भले ही उसके लिए श्रमजीवियों पर टैक्स लगाना पड़े। इन शिक्षित लोगों ने यहाँ तक प्रचार किया कि शिक्षा को अत्यधिक महत्व देना चाहिए, भले ही अपराध न रुके। यहाँ तक कि उन्होंने शिक्षा को अपराध नियंत्रण का भी एक प्रभावी उपाय घोषित कर दिया।

परिणामस्वरूप, श्रम के प्रति लोगों की रुचि कम हो गई और शिक्षा तथा श्रम के बीच की दूरी लगातार बढ़ती चली गई।

मैं भी शिक्षा को महत्वपूर्ण मानता हूँ, लेकिन इस बात से सहमत नहीं हूँ कि शिक्षा के विस्तार के लिए श्रम का शोषण आवश्यक है। मेरे विचार से श्रम और शिक्षा—दोनों को स्वतंत्र रूप से, अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए, न कि किसी के शोषण के माध्यम से।

मैं सरकारी कर्मचारियों को अत्यधिक वेतन देने के पक्ष में नहीं हूँ। मैं शिक्षा के लिए अलग से टैक्स लगाकर खर्च करने के पक्ष में भी नहीं हूँ। शिक्षा का खर्च शिक्षा प्राप्त करने वाला स्वयं वहन करे—यह मेरा मत है। श्रमजीवी वर्ग पर इसका भार क्यों डाला जाए?

मैंने यह प्रस्ताव रखा है कि नई समाज व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार आगे बढ़े। सरकार किसी को विशेष प्रोत्साहन न दे और न ही किसी की सहायता के लिए किसी अन्य से टैक्स वसूले।

हम इस नई व्यवस्था में समानता की बजाय स्वतंत्रता को अधिक महत्व देंगे। इसलिए मेरा सुझाव है कि सरकार किसी भी परिस्थिति में प्रगति के लिए कमजोर वर्ग की सहायता न करे।