न्यायपालिका और विपक्ष की भूमिका: आवश्यकता या हस्तक्षेप

यह एक गंभीर प्रश्न खड़ा हो गया है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में क्या विपक्ष के नेता की उपस्थिति आवश्यक है? क्या इस प्रक्रिया में न्यायालय के न्यायाधीश को भी शामिल किया जाना चाहिए?

यदि हम इस विषय पर विचार करें, तो भारतीय लोकतंत्र तीन अलग-अलग संस्थाओं के संतुलन पर चलता है—एक है विधायिका, दूसरी न्यायपालिका और तीसरी कार्यपालिका। तीनों की स्वतंत्रताएं और सीमाएं अलग-अलग हैं। विधायिका का गठन आम जनता द्वारा मतदान के माध्यम से होता है, न्यायपालिका की नियुक्ति न्यायपालिका की सलाह पर कार्यपालिका द्वारा की जाती है, और कार्यपालिका का गठन विधायिका करती है। यही लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। यद्यपि न्यायपालिका ने यह अधिकार अपने पास बलपूर्वक सुरक्षित कर लिया है, यह अलग विषय है।

हम यहाँ मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की बात कर रहे हैं। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कार्यपालिका करती है, जिसमें विधायिका या न्यायपालिका का प्रत्यक्ष योगदान नहीं होता। चुनाव आयुक्त कार्यपालिका से ही चुने जाते हैं; कोई पूर्णतः स्वतंत्र व्यक्ति सीधे इस पद पर नियुक्त नहीं होता। इस प्रकार कार्यपालिका अपने ही ढांचे के भीतर एक निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से चुनाव आयुक्तों का चयन करती है। यह प्रक्रिया विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों के अंतर्गत निर्धारित होती है।

प्रश्न यह उठता है कि जब यह कार्यपालिका का विशेषाधिकार है, तो इसमें विपक्ष के नेता अथवा न्यायपालिका को क्यों शामिल किया जाए? चुनाव आयोग का मुख्य कार्य केवल विधायिका के चुनाव संपन्न कराना है; उसका कार्यपालिका या न्यायपालिका के अन्य कार्यों से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है और न ही वह किसी अन्य संस्था की नियुक्ति करता है।

जब चुनाव आयोग केवल विधायिका के चुनाव कराता है, तो विधायिका या न्यायपालिका के प्रतिनिधियों का उसकी नियुक्ति प्रक्रिया में हस्तक्षेप क्यों होना चाहिए?

मेरे विचार से चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायपालिका या विधायिका का हस्तक्षेप शून्य होना चाहिए।