बदलते भारत में बकरीद और सामाजिक समीकरण
मैं तो अपने जन्म से ही बकरीद का त्योहार देखा आ रहा हूँ। पहले भी बकरीद का त्योहार शांति से होता था और इस बार भी शांति से हो रहा है, लेकिन एक बात बहुत विपरीत दिख रही है कि पहले की बकरीद में हिंदू डरा हुआ होता था और मुसलमान विजेता था।
मैंने स्वयं दिल्ली में देखा है कि किस तरह मुसलमान सड़कों पर नमाज पढ़ता था। सड़कों पर उसने चिन्ह लगा दिए थे और उस जमीन को नमाज के लिए सुरक्षित मानता था। उस समय मुसलमान आक्रामक था, हिंदू रास्ता बदलकर आता-जाता था। लेकिन आज हिंदू आक्रामक है, मुसलमान डरा हुआ है। सड़कों पर नमाज नहीं हो रही है। अगर हिंदुओं की सहमति न हो तो गाय-भैंस तो क्या, बकरा भी नहीं काटा जा रहा है।
भारत का मुसलमान पहले विशेष अधिकार मांग रहा था, अब समान अधिकार भी गनीमत समझ रहा है। असम में समान नागरिक संहिता लागू हो गई और किसी मुसलमान ने देशभर में विरोध नहीं किया, क्योंकि मुसलमान को अंतिम भरोसा ममता बनर्जी पर था। ममता बनर्जी ने बार-बार यह घोषणा की थी कि जब तक उसके शरीर में प्राण हैं, तब तक मुसलमान को डरने की जरूरत नहीं है। सारे मुसलमान बंगाल में आकर रहो, मैं सुरक्षा दूंगी, क्योंकि बंगाल की शेरनी अभी जीवित है।
लेकिन जब से बंगाल की शेरनी बेहोश हो गई है, तब से मुसलमान का विश्वास टूट गया है। अब देशभर का मुसलमान हिंदुओं को बराबरी का अधिकार देने के लिए तैयार है और मुझे ऐसा आभास होता है कि जल्दी ही देशभर में समान नागरिक संहिता लागू हो जाएगी और भारत का मुसलमान अब स्वीकार कर लेगा, क्योंकि अब ममता बनर्जी अशक्त हो गई है।
15 दिनों में ही मुसलमान में इतना बड़ा बदलाव यह सिद्ध करता है कि मुसलमान उतना गलत नहीं था, जितना विपक्ष मुसलमान का गलत उपयोग कर रहा था।
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