राज्य और धर्मगुरु: समाज नियंत्रण की राजनीति

स्पष्ट दिखाई देता है कि राज्य अक्सर समाज को नियंत्रित करने के लिए धर्मगुरुओं का उपयोग करता है, क्योंकि सामान्यतः समाज पर धर्मगुरुओं का गहरा प्रभाव होता है। कई बार धर्मगुरु अपना मूल कार्य छोड़कर राज्य की चापलूसी करने लगते हैं। बदले में राज्य उन्हें सम्मान भी देता है और विभिन्न प्रकार से सहायता भी करता है।

यदि आप वर्तमान भारतीय धर्मगुरुओं की समीक्षा करें, तो पाएँगे कि भारत का लगभग हर धर्मगुरु—चाहे वह किसी भी संस्था से जुड़ा हो—हमेशा यह मांग करता दिखाई देता है कि सरकार तंबाकू रोके, सरकार शराब रोके, सरकार दहेज रोके और सरकार समाज की सारी बुराइयों को दूर करे। दूसरी ओर, ये धर्मगुरु स्वयं केवल अपनी पूजा करवाते रहें और भौतिक सुख-सुविधाओं का उपभोग करते रहें—ऐसी प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है।

धर्मगुरुओं का पतन यहाँ तक दिखाई देता है कि आज कई धर्मगुरु समाज को हिंसा की सलाह देते हैं और सरकार को हिंसा रोकने की सलाह देते हैं।

वास्तव में कोई भी सरकार यह नहीं चाहती कि धर्मगुरु स्वयं सामाजिक बुराइयों को दूर करें या समाज में अहिंसा का व्यापक प्रचार करें। क्योंकि यदि धर्मगुरु समाज में सक्रिय होकर इन बुराइयों को दूर करने लगेंगे, तो समाज की राज्य पर निर्भरता कम हो जाएगी। इसलिए राज्य चाहता है कि समाज की हर प्रकार की गतिविधियों में उसका निर्णायक हस्तक्षेप बना रहे और धर्मगुरुओं की भूमिका धीरे-धीरे शून्य हो जाए।

ऐसी स्थिति में हमारा कर्तव्य है कि राज्य की इस चालाकी का पर्दाफाश किया जाए। हमें धर्मगुरुओं को यह सलाह देनी चाहिए कि सामाजिक बुराइयों को दूर करना हमारा कार्य है, सरकार का नहीं। सुरक्षा और न्याय देना सरकार का कार्य है, हमारा नहीं।

इस प्रकार सरकार और धर्मगुरुओं के कार्य स्पष्ट रूप से अलग-अलग होने चाहिए और दोनों को अपनी-अपनी सीमाओं में रहकर कार्य करना चाहिए।