लोकतंत्र की हत्या: राजनीतिक नारा या वास्तविकता?

 

मैंने कल सुना कि मध्य प्रदेश के राज्यसभा चुनाव में लोकतंत्र की हत्या हो गई। यह बात किसी साधारण व्यक्ति ने नहीं कही, बल्कि एक बहुत बड़े नेता ने कही। "लोकतंत्र की हत्या हो गई" — यह बात कई बार कपिल सिब्बल भी कर चुके हैं, अरविंद केजरीवाल भी कर चुके हैं, और राहुल गांधी तो कहते ही रहते हैं। मैं वर्षों से सुन रहा हूँ कि लोकतंत्र की हत्या हो गई।

मैं आज तक नहीं समझ सका कि क्या लोकतंत्र कोई रावण है, जो रोज मर जाता है और मरने के तुरंत बाद फिर जीवित हो जाता है? "लोकतंत्र की हत्या" शब्द का उपयोग क्यों किया जाता है और इसकी सच्चाई क्या है?

वास्तविकता यह है कि भारत में लोकतंत्र का कोई नया विकल्प आना चाहिए और नया विकल्प लागू करके लोकतंत्र की हत्या कर देनी चाहिए, इससे मैं सहमत हूँ। लेकिन जब तक नया विकल्प नहीं आता, तब तक न तो लोकतंत्र की हत्या हो सकती है और न आज तक कभी हुई है।

आप बताइए कि यह कैसा सड़ा-गला लोकतंत्र है भारत में, कि भारत का कोई प्रधानमंत्री नॉर्वे जाता है और वहाँ कोई पत्रकार मनमाना प्रश्न करना चाहता है, और यदि इस प्रकार के प्रश्न को स्वीकार न किया जाए तो लोकतंत्र की हत्या हो जाती है।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार पत्रकारों को धक्का देकर बाहर निकाल दिया। मेरे विचार से ट्रंप ने बिल्कुल ठीक किया। अभी कुछ दिन पहले ही भारत के मुख्य न्यायाधीश ब्रिटेन में किसी विषय पर भाषण देने गए थे और उस विषय से हटकर कुछ लोग प्रश्न कर रहे थे, तथा उस प्रश्नकर्ता को लोकतंत्र का प्रतीक माना जा रहा था। क्या यही लोकतंत्र है?

अगर लोकतंत्र में आपको प्रश्न करने की छूट है, तो तर्क करने की छूट भी होनी चाहिए। वैसे तो लोकतंत्र में प्रश्न करने की छूट भी आपसी सहमति से ही हो सकती है, बिना सहमति के नहीं। यदि इस प्रकार प्रश्न करने की मीडिया को स्वतंत्रता ही लोकतंत्र है, तो ऐसे लोकतंत्र की हमें आवश्यकता नहीं है।

हम इस लोकतंत्र का नया विकल्प देना चाहते हैं, जहाँ प्रश्नकर्ता की सहमति से ही प्रश्न पूछा जा सके और उत्तर देना या न देना उत्तरदाता की स्वतंत्रता पर निर्भर हो, प्रश्नकर्ता के आग्रह पर नहीं।