हमें प्रसन्नता है कि हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी विवाद पर समय रहते हस्तक्षेप किया और नए कानूनों पर रोक लगा दी।

हमें प्रसन्नता है कि हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी विवाद पर समय रहते हस्तक्षेप किया और नए कानूनों पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बिल्कुल सही दिशा अपनाई है।
बहुत लंबे समय से सरकार को घेरने के लिए एक सुनियोजित जाल बिछाया गया था। सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई, जिसमें यह आरोप लगाया गया कि शिक्षा संस्थानों में बड़े पैमाने पर भेदभाव हो रहा है। याचिका में यह भी कहा गया कि पिछले वर्षों की तुलना में वर्तमान समय में भेदभाव के मामलों की संख्या काफी बढ़ गई है। सुप्रीम कोर्ट इस तर्क से सहमत हुआ और इस विषय में नए कानून बनाने के निर्देश दिए।
इसी आधार पर यूजीसी में विपक्षी दलों से जुड़े लोगों ने एकजुट होकर यह मांग उठाई कि वर्तमान कानून भेदभावपूर्ण हैं और इन्हें बदला जाना चाहिए। इस मांग के पक्ष में बहुमत था, जिसमें विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के ओबीसी और दलित वर्ग से जुड़े लोग भी शामिल थे। सरकार इस दबाव के आगे मजबूर हुई और उसे वे गलत कानून स्वीकार करने पड़े।
विपक्ष ने इसे एक बड़े अवसर के रूप में देखा और इसे अपना अंतिम दौर मान लिया। विपक्ष को लगा कि अब सवर्ण और आवरण के बीच सड़कों पर खुला टकराव होगा और समाज दो भागों में बंटकर सरकार को घेर लेगा। पिछले कुछ दिनों में विपक्ष ने पूरा नाटक किया और समस्त दोष सरकार पर डालने का प्रयास किया।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल हस्तक्षेप कर विपक्ष के सभी सपनों पर पानी फेर दिया। आज न्यायालय ने विपक्षी दबाव में बनाए गए कानून पर रोक लगा दी। इतने लंबे समय की तैयारी के बाद विपक्ष जिस सपने को साकार करना चाहता था, उसका मुख्य हथियार ही छिन गया। अब विपक्ष को किसी नए तरीके से फिर से तैयारी करनी पड़ेगी।
मैं इस पूरे घटनाक्रम को सार्थक मानता हूं, क्योंकि पहली बार आरक्षण के विषय पर गंभीर बहस शुरू हुई है। मेरे विचार से अब पूरे समाज को आरक्षण व्यवस्था पर समग्र रूप से जागरूक होकर विचार करना चाहिए।