जेन जी सशक्तिकरण पर सवाल: क्या उम्र अपराध से ऊपर है?

19 अगस्त प्रातः कालीन सत्र। भारत में जेन जी, जेन अल्फा सशक्तिकरण की बहुत चर्चा हो रही है। साथ ही मैंने एक यह भी समाचार पढ़ा कि मेरठ की एक जेल में सर्वे किया गया तो वहां कुल कैदियों में से 50% से अधिक जेन जी कैदी निकले। अब प्रश्न उठता है कि जब कुल आबादी में जेन जी की संख्या 25% के ही आसपास है, तब ऐसे अपराधों में इस प्रकार के बच्चों की भूमिका अपनी आबादी की तुलना में दोगुनी क्यों है। यदि आप ठीक से समझेंगे तो वृद्ध लोगों पर अत्याचार करने के मामले में भी जेन जी का प्रतिशत ही आपको अधिक मिलेगा, चाहे वे महिला हों या पुरुष।

अब यदि इन दोनों बातों पर विचार किया जाए तो एक गंभीर प्रश्न खड़ा हो जाता है कि क्या हम युवाओं के नाम पर उन्हें अधिक महत्व और शक्ति दें। क्या युवाओं में अन्य लोगों की तुलना में अपराधियों का प्रतिशत कम है और यदि नहीं है तो यह युवा, जवान और वृद्ध का बंटवारा क्यों? यह बंटवारा समाज क्यों करेगा, यह बंटवारा राज्य क्यों करेगा, यह बंटवारा संविधान क्यों करेगा? यह बंटवारा परिवार करेगा। परिवार के लोग आपस में बैठकर इस बात का निर्णय ले सकें कि हमें किस कमजोर को शक्तिशाली बनाना है और किस शक्तिशाली को कमजोर करना है।

हम ऐसा क्यों मान लें कि परिवार के लोग इतना निर्णय नहीं कर सकेंगे और यह मुट्ठी भर राजनेता, मुट्ठी भर धर्मगुरु हमारे परिवार के विषय में निर्णय करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए मेरा यह सुझाव है कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था ने परिवार व्यवस्था में अनावश्यक हस्तक्षेप किया है। हम राजनीतिक व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था में भी कुछ सुधार करना चाहते हैं। यही कारण है कि हम परिवार व्यवस्था को सामाजिक और संवैधानिक व्यवस्था का आधार बनाने के पक्षधर हैं।