वर्तमान समय में हत्या और अन्य गंभीर अपराधों में धर्म और राज्य की भूमिका अपेक्षा से कहीं अधिक दिखाई देने लगी है, जबकि मूलतः

आज सुबह मैंने एक लेख लिखा, जिसमें यह विचार रखा गया कि वर्तमान समय में हत्या और अन्य गंभीर अपराधों में धर्म और राज्य की भूमिका अपेक्षा से कहीं अधिक दिखाई देने लगी है, जबकि मूलतः धर्म को समाज के मार्गदर्शन और राज्य को उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। यह स्थिति क्यों बनी—इस पर गंभीरता से विचार आवश्यक है।
मेरे अनुसार इसका मुख्य कारण यह है कि धर्म और राज्य—दोनों ने अपने संस्थागत स्वरूप को छोड़कर संगठनात्मक स्वरूप अपना लिया। जैसे ही कोई इकाई संगठन बनती है, उसमें प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है और प्रतिस्पर्धा के साथ संघर्ष, वर्चस्व और टकराव की समस्याएँ अनिवार्य रूप से पैदा होती हैं। संगठन सामान्यतः शक्तिशाली समूहों से स्वयं की रक्षा के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन व्यवहार में वे प्रायः कमजोरों पर अत्याचार करने लगते हैं। परिणामस्वरूप समाज कमजोर पड़ा और राज्य समाज पर ही दमन करने लगा।
इसी प्रकार, जब तक धर्म संस्थागत स्वरूप में था, तब तक वह समाज का नैतिक और बौद्धिक मार्गदर्शन करता रहा। लेकिन जैसे ही धर्म संगठनात्मक स्वरूप में परिवर्तित हुआ, वह भी संघर्ष और टकराव की राजनीति में उतर आया। अब तक इस संगठनवाद के लिए मुख्यतः इस्लाम को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है, किंतु अब धीरे-धीरे हिंदुत्व भी उसी दिशा में बढ़ता दिखाई देने लगा है।
हिंदुत्व का संगठन के रूप में उभरना समस्या है या समाधान—यह एक अलग विषय है। किंतु इतना स्पष्ट है कि समाज को संगठनवाद से मुक्त होना ही होगा। इस मुक्ति की पहल या तो इस्लाम को स्वयं करनी होगी, या फिर परिस्थितियाँ और राज्य उसे इसके लिए बाध्य करेंगे।
हिंदुओं को संगठित करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है। किंतु पिछले सात–आठ वर्षों में संघ भी धीरे-धीरे हिंदू संगठन बनने के स्थान पर एक संस्थागत स्वरूप की ओर बढ़ता हुआ दिखाई देता है। एक ओर राज्य इस्लाम को उसके संगठनात्मक चरित्र पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर रहा है, तो दूसरी ओर संघ के नेतृत्व में हिंदुत्व के भीतर संगठनवाद को कमजोर करने की प्रक्रिया चल रही है।
संघ में दिखाई दे रहे इस परिवर्तन से मैं संतुष्ट हूँ। साथ ही, मैं इस्लाम से भी यह विनम्र निवेदन करता हूँ कि वह अपने संगठनात्मक स्वरूप पर गंभीरता से विचार करे और धर्म को पुनः मार्गदर्शन की भूमिका में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़े।