वर्तमान समय में जो नई राज्य-व्यवस्था हमें दिखाई दे रही है, वह केवल भारत में ही गड़बड़ है—ऐसा नहीं है।
वर्तमान समय में जो नई राज्य-व्यवस्था हमें दिखाई दे रही है, वह केवल भारत में ही गड़बड़ है—ऐसा नहीं है। वास्तव में पूरी दुनिया की राजनीतिक व्यवस्था गड़बड़ा चुकी है। लोकतंत्र का अर्थ ही बदल दिया गया है। पश्चिम का जो सड़ा-गला लोकतंत्र है, उसी लोकतंत्र का हम भारतवासी भी अनुसरण कर रहे हैं। इस सड़े-गले लोकतंत्र में संविधान भी तंत्र का गुलाम बन गया है। समाज के अस्तित्व को लगभग समाप्त कर दिया गया है।
इसलिए हमें पूरी दुनिया की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करना पड़ेगा और उसमें सुधार करना होगा। यह सुधार भारत से ही संभव है, क्योंकि भारत एक विचार-प्रधान देश है और दुनिया भारत के पीछे चल सकती है। अतः इस सड़े-गले लोकतंत्र के स्थान पर हमें स्वराज प्रणाली पर विचार करना चाहिए।
इस प्रणाली में मूलभूत अंतर यह है कि इसमें एक संविधान सभा अलग होती है। तंत्र, संविधान सभा और राष्ट्रपति—तीनों स्वतंत्र इकाइयाँ होती हैं और तीनों मिलकर ही संविधान बना सकती हैं; कोई एक इकाई अकेले नहीं। इसी आधार पर दुनिया का एक साझा संविधान बन सकता है, जिसमें एक राष्ट्रपति, एक संविधान सभा और एक तंत्र की संरचना हो।
इस प्रकार तंत्र में लोक का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप संभव होगा। वर्तमान समय में संविधान निर्माण या संशोधन में लोक की कोई वास्तविक भूमिका नहीं है; यह कार्य तंत्र स्वयं कर लेता है। इसलिए मेरा यह सुझाव है कि इस सड़े-गले लोकतंत्र के स्थान पर हमें लोक-स्वराज प्रणाली पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
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