भारत में समय-समय पर हिंदू राष्ट्र की आवाज़ उठती रहती है।
भारत में समय-समय पर हिंदू राष्ट्र की आवाज़ उठती रहती है। कभी यह कहा जाता है कि सभी हिंदुओं को एकजुट हो जाना चाहिए, तो कभी हिंदुओं के सशस्त्र होने की बात भी सामने आती है। कुछ धर्मगुरु तो हिंदुओं को भाला रखने तक की सलाह देते हैं। लेकिन मेरे विचार से यह सब बातें अधिकतर सस्ती लोकप्रियता के लिए कही जाती हैं।
जो लोग हिंदुओं को संगठित होने की सलाह देते हैं, वे स्वयं संगठित नहीं हैं। न शंकराचार्य आपस में संगठित हैं, न धर्मगुरु, न ही हिंदू राजनेता। इसी तरह जो लोग शस्त्र रखने की बात करते हैं, उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी शस्त्र का प्रयोग नहीं किया है। इसलिए इस विषय में हिंदुओं को सावधान रहना चाहिए और ऐसे पेशेवर लोगों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए।
यदि हम संगठित होना ही चाहते हैं, तो केवल वर्तमान सरकार के समर्थन में संगठित रहना पर्याप्त है। अन्य मामलों में भावनात्मक रूप से संगठित होने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमारी सुरक्षा व्यवस्था के माध्यम से हो सकती है।
यदि हमें मुस्लिम आतंकवाद से खतरा है, तो हमें आतंकवाद के खिलाफ सभी को एकजुट करना चाहिए। इसमें ईसाई, यहूदी, पारसी—किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। यहाँ तक कि मुसलमानों में जो शांतिप्रिय लोग हैं, उन्हें भी अपने साथ जोड़ा जाना चाहिए। मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं को संगठित करना उचित नहीं है।
इसलिए मेरा स्पष्ट सुझाव है कि हमें बुद्धि से काम लेना चाहिए और इतनी सावधानी अवश्य रखनी चाहिए कि कोई हमारी भावनाओं का दुरुपयोग न कर सके।
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