यह बात पूरी तरह सही है कि पंडित नेहरू ने भारत को हिंदू-मुक्त क्षेत्र के रूप में ढालने की योजना बनाई थी।
यह बात पूरी तरह सही है कि पंडित नेहरू ने भारत को हिंदू-मुक्त क्षेत्र के रूप में ढालने की योजना बनाई थी। इसी के अंतर्गत उन्होंने मुसलमानों को विशेष अधिकार दिए, ईसाइयों को प्रोत्साहित किया और साम्यवाद का भी लगभग पूर्ण रूप से अनुकरण किया। उनका मानना था कि हिंदू-मुक्त भारत बनाने के लिए इन तीनों का सामूहिक प्रोत्साहन आवश्यक है।
लेकिन यह विडंबना ही है कि आज नेहरू परिवार के ही नेतृत्व में भारत सांप्रदायिकता-मुक्त बनने की दिशा में बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी ने दो-तीन दिन पहले यह बात कही थी कि किसी का समय हमेशा एक-सा नहीं रहता। यह कथन अब सत्य सिद्ध होता दिख रहा है। नेहरू परिवार का भी समय लगभग साठ वर्षों के बाद लगातार बदलता जा रहा है।
आज नेहरू परिवार के सामने ही यह स्पष्ट है कि हिंदुत्व मजबूत हो रहा है, इस्लाम कमजोर पड़ रहा है, ईसाइयत का प्रभाव भी घट रहा है और साम्यवाद तो वैचारिक धरातल पर लगभग समाप्त हो चुका है। यही कारण है कि राहुल गांधी आज गंभीरता से यह विचार कर रहे हैं कि क्या नेहरू की नीति पर आँख मूँदकर चलते रहना चाहिए, या फिर हिंदुत्व के साथ किसी प्रकार का समझौता करना चाहिए।
मैंने वह समय भी देखा है जब छोटी-छोटी बातों पर मुसलमान सड़कों पर उतर आते थे और हिंदुओं के घरों में घुस जाते थे। कश्मीर में हज़रत मोहम्मद के बाल के चोरी होने की घटना हो, म्यांमार के दंगे हों या फिलिस्तीन के समर्थन का मुद्दा—इन सभी को आधार बनाकर बड़ी संख्या में मुसलमान सड़कों पर निकलते थे और हिंदू घरों में घुस जाते थे।
लेकिन आज राहुल गांधी की आँखों के सामने ही यह परिदृश्य बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। अब हिंदू सड़कों पर निकल रहे हैं और मुसलमान पत्थर चलाने में भी हिचकिचा रहे हैं। आमतौर पर अब मुसलमानों को यह लगने लगा है कि यदि पत्थर चले, तो सरकार बुलडोज़र भी चला सकती है।
सच है—दिन बदलते देर नहीं लगती।
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