वर्तमान स्थिति में हमें समाज में अराजकता दिखाई देती है। इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य या सरकार के पास न्यूनतम शक्ति है, जबकि
29 जनवरी, प्रातःकालीन सत्र
वर्तमान स्थिति में हमें समाज में अराजकता दिखाई देती है। इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य या सरकार के पास न्यूनतम शक्ति है, जबकि उस पर अधिकतम दायित्व थोप दिए गए हैं। सिद्धांततः स्थिति इसके विपरीत होनी चाहिए—राज्य के पास अधिकतम शक्ति और न्यूनतम दायित्व होने चाहिए।
यह त्रुटि समाज से हुई है या राज्य से—यह अलग विषय है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि कहीं न कहीं गंभीर भूल अवश्य हुई है। सामान्यतः यह माना जाता है कि वर्तमान समय में राज्य के पास अत्यधिक शक्ति है, किंतु मैं इस धारणा से सहमत नहीं हूँ। मेरे अनुसार राज्य के पास आज उतनी शक्ति नहीं है, जितनी वास्तव में होनी चाहिए थी।
वर्तमान कानूनों के अनुसार राज्य किसी अपराधी को सत्य बोलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। मेरे विचार में यह कानून मूलतः गलत है। यदि किसी व्यक्ति के किसी अपराध में सम्मिलित होने के प्राथमिक प्रमाण सिद्ध हो जाते हैं, तो उस व्यक्ति को सत्य बोलने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। यदि वह सत्य न बोले, तो उसे सीधे अपराधी माना जाना चाहिए।
गोपनीयता से संबंधित कानून भी कई स्तरों पर न्याय प्रक्रिया में बाधक सिद्ध हो रहे हैं। इसी कारण अब हमें एक नई व्यवस्था पर विचार करना आवश्यक हो गया है।
नई व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वतंत्रता असीम होगी, किंतु यह स्वतंत्रता पूर्णतः व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संयुक्त स्वरूप की होगी। व्यक्ति जिस परिवार से जुड़ेगा, उसकी असीम व्यक्तिगत स्वतंत्रता स्वाभाविक रूप से उस परिवार की संयुक्त व्यवस्था में समाहित हो जाएगी।
इस प्रकार व्यक्ति की स्वतंत्रता और सहजीवन की अनिवार्यता के बीच संतुलन स्थापित करना ही समाज-विज्ञान का मूल तत्व होना चाहिए। इसी आधार पर समाज व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए।
मैं पुनः स्पष्ट करना चाहता हूँ कि राज्य को “अधिकतम शक्ति और न्यूनतम दायित्व” के सिद्धांत का पालन करना चाहिए, जिसे वर्तमान समय में राज्य प्रभावी रूप से लागू नहीं कर पा रहा है।
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