आज हम महिला–पुरुष संबंधों पर विस्तृत सुझाव प्रस्तुत कर रहे हैं।
5 फरवरी – प्रातःकालीन सत्र
आज हम महिला–पुरुष संबंधों पर विस्तृत सुझाव प्रस्तुत कर रहे हैं। इस विषय में अब तक कुछ मूलभूत गलतियाँ हुई हैं, जिन्हें स्पष्ट रूप से पहचानना आवश्यक है।
पहली गलती यह रही कि महिला और पुरुष को अलग-अलग वर्ग मान लिया गया, जबकि महिला और पुरुष अलग-अलग व्यक्ति हो सकते हैं, वर्ग नहीं।
दूसरी गलती यह हुई कि परिवार व्यवस्था को एक प्राकृतिक इकाई मान लिया गया, जबकि वास्तव में परिवार को एक संगठनात्मक इकाई के रूप में विकसित किया जाना चाहिए था।
तीसरी गलती यह रही कि महिला–पुरुष समानता का नारा दिया गया, जबकि सही दृष्टिकोण यह होना चाहिए था कि प्रत्येक व्यक्ति की समानता का सिद्धांत स्थापित किया जाए, न कि केवल महिला और पुरुष के बीच तुलना की जाए।
चौथी और सबसे गंभीर गलती यह हुई कि महिला–पुरुष संबंधों में राजनेताओं को हस्तक्षेप की पूर्ण स्वतंत्रता दे दी गई। इसके परिणामस्वरूप आज तक राजनेता यह भी स्पष्ट नहीं कर पाए हैं कि वे महिला और पुरुष के बीच दूरी कम करने के पक्षधर हैं या बढ़ाने के। व्यवहार में उन्होंने दोनों विपरीत दिशाओं में एक साथ कार्य किया है।
इन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाकर समाज में वर्ग-विद्वेष को फैलाया गया।
अब इस विषय में कुछ नई नीतियों पर विचार किया जा सकता है। जो महिलाएँ निरंतर महिलाओं पर अत्याचार के व्यापक नैरेटिव को आगे बढ़ाती हैं, ऐसी प्रवृत्तियों का स्पष्ट सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। महिला सशक्तिकरण की वर्तमान अवधारणा को पूरी तरह समाज-विरोधी मानते हुए किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
परिवार को एक संगठनात्मक इकाई के रूप में पुनर्गठित किया जाए और परिवार के भीतर महिला-पुरुष का भेद किए बिना सभी की भूमिकाओं को संयुक्त रूप में परिभाषित किया जाए। परिवार के प्रत्येक सदस्य को परिवार का सहभागी माना जाए, केवल सहयोगी नहीं।
भारतीय संविधान से महिला और पुरुष जैसे शब्दों को पूरी तरह हटाकर व्यक्ति-केंद्रित भाषा को अपनाया जाए। महिला-पुरुष संबंधों में राजनीतिक हस्तक्षेप को पूर्णतः समाप्त कर दिया जाए।
संभव है कि ये सुझाव महिला-पुरुष संघर्ष को कम करने और सामाजिक संतुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध हों। अन्य सुझावों पर भी चर्चा के लिए मैं पूर्णतः तैयार हूँ।
Comments