हम नई समाज व्यवस्था पर निरंतर चर्चा कर रहे हैं। इस नई समाज व्यवस्था के संदर्भ में हमारे सामने अनेक प्रकार की समस्याएँ दिखाई देती हैं, किंतु

6 फरवरी – प्रातःकालीन सत्र
हम नई समाज व्यवस्था पर निरंतर चर्चा कर रहे हैं। इस नई समाज व्यवस्था के संदर्भ में हमारे सामने अनेक प्रकार की समस्याएँ दिखाई देती हैं, किंतु यह स्पष्ट है कि इन सभी समस्याओं का समाधान एक साथ संभव नहीं है। वास्तव में, जो समस्याएँ आज हमारे सामने प्रकट हो रही हैं, वे मूलतः कुछ गिनी-चुनी—दो या तीन—मूलभूत समस्याओं के बाय-प्रोडक्ट हैं। जैसे ही ये मूल समस्याएँ दूर होंगी, उनके परिणामस्वरूप उत्पन्न अधिकांश लक्षण अपने आप समाप्त हो जाएँगे।
इसी कारण हमें लक्षणों पर अधिक समय न देकर मूलभूत समस्याओं पर केंद्रित चर्चा करनी चाहिए।
हमारी प्रमुख मूलभूत समस्याओं में पहली समस्या है—राजनीति का निरंतर और अत्यधिक सशक्त होते जाना।
दूसरी समस्या है—समाज का लगातार कमजोर होते जाना।
तीसरी समस्या है—हमारी वर्ण व्यवस्था का निरंतर विघटन।
यदि हम इन तीन समस्याओं के समाधान खोजने में सफल हो जाएँ, तो न केवल भारत बल्कि विश्व की अनेक जटिल समस्याएँ स्वतः ही कम हो जाएँगी या नियंत्रित हो सकेंगी।
हमने इन तीनों समस्याओं के कारणों पर भी गंभीरता से विचार किया है, उनके संभावित समाधानों पर भी चर्चा की है और अपनी सक्रियता को भी इन्हीं दिशाओं से जोड़ने का प्रयास किया है।
पहली समस्या—राजनीति के अत्यधिक सशक्तिकरण—के समाधान के लिए हमें संविधान को तंत्र के प्रभाव से मुक्त करना होगा। इसका एकमात्र समाधान है तंत्र-मुक्त संविधान।
दूसरी समस्या—समाज के कमजोर होते जाने—के समाधान के लिए परिवार व्यवस्था को सशक्त बनाना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त कोई वैकल्पिक मार्ग नहीं है।
तीसरी समस्या—वर्ण व्यवस्था—के संदर्भ में हमें ब्राह्मण शब्द के स्थान पर मार्गदर्शक शब्द को स्थापित करना होगा, ताकि वर्ण व्यवस्था को जन्म या वर्चस्व से अलग कर उसके नैतिक और वैचारिक अर्थ को पुनः परिभाषित किया जा सके।
यदि हम इन तीनों दिशाओं में एक साथ और समन्वित रूप से आगे बढ़ सकें, तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि हम न केवल समाज, बल्कि पूरी दुनिया की समस्याओं के समाधान की दिशा में एक ठोस शुरुआत कर सकेंगे।