राज्य, व्यक्ति और समाज का प्रश्न

राज्य कभी भी समाज के वास्तविक अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। राज्य व्यक्ति के अस्तित्व को तो स्वीकार करता है, व्यक्ति-समूहों के अस्तित्व को भी मान लेता है, लेकिन समस्त व्यक्तियों के संयुक्त रूप—अर्थात् समाज—को एक स्वतंत्र और मूल इकाई के रूप में स्वीकार नहीं करता। यही कारण है कि राज्य राष्ट्र को अंतिम इकाई मानता है और राष्ट्रों के ऊपर केवल अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को ही महत्व देता है, परंतु “विश्व-समाज” जैसी किसी व्यापक मानवीय इकाई को मान्यता नहीं देता। वह संयुक्त मानव समाज के अस्तित्व को स्वीकार करने से बचता है, क्योंकि प्रत्येक राज्य व्यवस्था स्वयं को सर्वोच्च मानने की प्रवृत्ति रखती है।
इसी कारण राज्य हमेशा प्रत्येक व्यक्ति को शासित मानता है और स्वयं को शासक के रूप में स्थापित करता है। राज्य निरंतर यह प्रयास करता है कि शासक और शासित के बीच की दूरी बढ़ती रहे। जो लोग शासित हैं, उन्हें अयोग्य, अज्ञानी या अशिक्षित कहकर उनका मनोबल गिराया जाता है, जबकि राज्य स्वयं को योग्य, सक्षम और सर्वज्ञानी सिद्ध करने का प्रयास करता रहता है।
शासन और शासित के बीच यही बढ़ी हुई दूरी राज्य को सर्वशक्तिमान बना देती है। स्थिति यहाँ तक पहुँच जाती है कि राज्य व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के स्वतंत्र अस्तित्व को भी स्वीकार नहीं करता। राज्य यह धारणा प्रस्तुत करता है कि व्यक्ति को जो भी मौलिक अधिकार प्राप्त हैं, वे राज्य या संविधान द्वारा दिए गए हैं।
इस प्रकार संचालक और संचालित के बीच जो दूरी निरंतर बढ़ती जा रही है, वह अत्यंत घातक है। इसलिए आवश्यक है कि इस समस्या पर गंभीरता से विचार किया जाए और इसका कोई संतुलित समाधान खोजा जाए।